
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुरः जिले के वनांचल में पीढ़ियों से काबिज आदिवासियों और वनवासियों को उनकी ही पुश्तैनी जमीन का मालिकाना हक देने के मामले में बड़ा झटका लगा है। सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, व्यक्तिगत वन अधिकार पत्र के लिए पहुंचे 25 हजार 565 दावों में से 16 हजार 985 आवेदन निरस्त कर दिए गए हैं। केवल आठ हजार 580 पात्र हितग्राहियों को ही मान्यता मिल सकी है।
जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में जल, जंगल और जमीन पर परंपरागत अधिकार सुरक्षित करने के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत निराशाजनक है। वन अधिकार अधिनियम के तहत वर्ष 2026-27 तक की समीक्षा रिपोर्ट दर्शाती है कि व्यक्तिगत पट्टों के 66 फीसदी से अधिक दावों को तकनीकी कमियों और दस्तावेजी पेच का हवाला देकर खारिज कर दिया गया है।
स्वीकृत 8580 आवेदनों के एवज में कुल 3038.962 हेक्टेयर रकबे को ही मान्यता दी गई है। वहीं दूसरी तरफ, सामुदायिक वन अधिकार पत्र के 824 प्राप्त दावों में से 563 स्वीकृत किए गए हैं, जबकि 261 मामले निरस्त हुए हैं। इसके तहत 568.437 हेक्टेयर भूमि मान्य की गई है।
सामुदायिक वन संसाधन अधिकार पत्र के मामले में स्थिति बेहतर रही है, जहां प्राप्त सभी 49 दावों को शत-प्रतिशत स्वीकार करते हुए 10 हजार 738.336 हेक्टेयर रकबे का अधिकार ग्राम सभाओं को सौंपा गया है। भारी संख्या में व्यक्तिगत दावों के निरस्त होने से वनांचल के आदिवासियों में गहरा रोष है। ग्रामीणों का आरोप है कि वन और राजस्व अमले के असहयोग व कागजी उलझनों के चलते उनके जायज हकों पर कैंची चलाई गई है।
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निरस्त दावों की दोबारा समीक्षा की मांग तेज
आदिवासी संगठनों का कहना है कि नियमों के अनुसार ग्राम सभा द्वारा अनुमोदित दावों को बिना ठोस स्थलीय सत्यापन व वाजिब कारण के सीधे निरस्त नहीं किया जा सकता। 17 हजार के करीब व्यक्तिगत दावों का खारिज होना प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रतिनिधियों ने कलेक्टर से खारिज फाइलों की पुनर्समीक्षा कराने की मांग उठाई है।
सामुदायिक संसाधन में मिली बड़ी जमीन, राहत
जिले में सामुदायिक वन संसाधन अधिकार पत्र के अंतर्गत सभी 49 दावों की स्वीकृति से वनांचल की ग्राम सभाओं को 10 हजार 738 हेक्टेयर से अधिक बड़े भू-भाग पर प्रबंधन का सीधा कानूनी हक मिला है। इससे लघु वनोपज संग्रहण, पारंपरिक संरक्षण और स्थानीय आजीविका को बढ़ावा मिलने की उम्मीद बंधी है।
वर्जन..
यह सीधे तौर पर गरीब वनांचलवासियों के साथ घोर अन्याय है। जब आदिवासियों को पुश्तैनी जमीन का मालिकाना हक देने की बात आती है, तब सरकार और प्रशासन को नियम याद आने लगते हैं। वहीं उद्योगपतियों को जमीन सौंपने के दौरान न पेसा कानून आड़े आता है और न ही कोई दूसरा नियम। वन अमले की मनमानी और तकनीकी कमियों का झूठा हवाला देकर आदिवासियों के जायज दावों को धड़ल्ले से निरस्त किया जा रहा है, जिसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सुभाष परते, प्रदेश अध्यक्ष सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग बिलासपुर