राहुन त्रिपाठी नईदुनिया, बिलासपुर: कारगिल युद्ध की कहानी केवल मोर्चे पर दुश्मन से लड़ने वाले सैनिकों तक सीमित नहीं है। इस विजय के पीछे ऐसे भी योद्धा थे, जिन्होंने तकनीकी सहायता और रसद आपूर्ति के जरिए सेना की ताकत बनाए रखी। बिलासपुर के होनरी कैप्टन रविन्द्रनाथ गोपाल और सुबेदार मेजर मोहनलाल ऐसे ही दो अनसुने नायक हैं। एक ने माइनस 20 डिग्री तापमान में बफोर्स और आईएफजी तोपों को हर समय युद्ध के लिए तैयार रखा, जबकि दूसरे ने दुश्मन की गोलाबारी के बीच सेना तक हथियार, गोला-बारूद, राशन और जरूरी सामग्री पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाई।
होनरी कैप्टन रविन्द्रनाथ गोपाल ने बताया कि वर्ष 1999 में वे आर्टिलरी सेंटर, हैदराबाद में पदस्थ थे। कारगिल युद्ध शुरू होने के बाद उन्हें जम्मू-कश्मीर के लेह स्थित थोइस बेस भेजा गया। वहां उनकी जिम्मेदारी बफोर्स और आईएफजी तोपों के स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराना तथा उनकी मरम्मत करना था, ताकि युद्ध के दौरान किसी भी समय तोपें बंद न पड़ें। उन्होंने बताया कि कई बार तापमान माइनस 20 डिग्री तक पहुंच जाता था।
दुश्मन ऊंची चोटियों पर था और भारतीय सेना नीचे से आगे बढ़ रही थी। ऐसे में बफोर्स और आईएफजी तोपों से लगातार कवरिंग फायर देकर सेना को आगे बढ़ाया गया। बटालिक, टाइगर हिल, प्वाइंट 5140 और प्वाइंट 4876 जैसी रणनीतिक चोटियों पर कब्जा दिलाने में इन तोपों की बड़ी भूमिका रही। उनकी टीम करीब 85 दिनों तक लगातार तकनीकी सहायता देती रही, जिससे तोपों की सर्विसेबिलिटी बनी रही।
दूसरी ओर, सुबेदार मेजर मोहनलाल जम्मू से लेह-लद्दाख तक सेना के लिए हथियार, गोला-बारूद, राशन, पानी और अन्य जरूरी सामग्री पहुंचाने वाले सैन्य काफिलों का हिस्सा थे। एक बार में करीब 150 वाहनों का काफिला निकलता था। टाइगर हिल क्षेत्र के संकरे रास्तों से रात में वाहनों को दुश्मन की नजर से बचाते हुए आगे बढ़ाया जाता था। हर पल दुश्मन की गोलाबारी का खतरा बना रहता था। उन्होंने बताया कि बर्फबारी शुरू होने से पहले अग्रिम चौकियों तक अधिकतम सैन्य सामग्री पहुंचाने के लिए स्वास्थ्य, परिवहन और रसद की अलग-अलग टीमें बनाई गई थीं।
होनरी कैप्टन रविन्द्रनाथ: माइनस २० डिग्री में बोफोर्स और IFG तोपों को रखा मुस्तैद
हम नीचे थे, दुश्मन ऊपर था होनरी कैप्टन रविन्द्रनाथ गोपाल बताते हैं कि कारगिल युद्ध की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि दुश्मन ऊंची चोटियों पर था और भारतीय सेना नीचे से आगे बढ़ रही थी। ऐसे में माइनस 20 डिग्री तापमान में तोपों को हर समय चालू रखना बेहद कठिन था। उनका कहना है कि थल सेना और वायुसेना के बेहतर समन्वय तथा सटीक युद्धनीति से आपरेशन विजय सफल हुआ।
सूबेदार मेजर मोहनलाल: गोलियों की बौछार के बीच 150 गाड़ियों के काफिले से पहुंचाई रसद
रास्ते में चली गोलियां, एक चालक हुआ शहीद सुबेदार मेजर मोहनलाल ने बताया कि जम्मू से लेह तक रात में सैन्य काफिलों को सुरक्षित पहुंचाना बेहद चुनौतीपूर्ण था। टाइगर हिल के पास दुश्मन की फायरिंग में एक चालक घायल हो गया, जबकि दूसरा शहीद हो गया। इसके बावजूद काफिला नहीं रुका और सेना तक जरूरी हथियार व राशन समय पर पहुंचाया गया।
कारगिल विजय: एक नजर में
- मई 1999 में शुरू हुआ कारगिल युद्ध करीब ढाई महीने तक चला।
- आपरेशन विजय के तहत भारतीय सेना ने टाइगर हिल, बटालिक, द्रास, प्वाइंट 5140 और प्वाइंट 4876 सहित सभी प्रमुख चोटियों को मुक्त कराया।
- 26 जुलाई 1999 को भारत ने विजय की घोषणा की। तभी से यह दिन कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।
जीत केवल मोर्चे पर नहीं, व्यवस्था में भी मिली
कारगिल युद्ध ने साबित किया कि जीत केवल मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों से नहीं मिलती। समय पर हथियार, गोला-बारूद, भोजन, ईंधन, दवाइयां और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी होता है। तकनीकी विशेषज्ञों और रसद टीमों के अदृश्य योगदान ने भारतीय सेना की युद्ध क्षमता को लगातार बनाए रखा और ऐतिहासिक विजय की मजबूत नींव रखी।