
नईदुनिया प्रतिनिधि गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित रहे क्षेत्रों में माओवादियों की ओर से छिपाई गई नकदी से जुड़ा चौंकाने वाला मामला सामने आया है। समाज की मुख्यधारा में लौटने का दावा करने वाले आत्मसमर्पित माओवादियों का नेटवर्क एक बार फिर बेनकाब हो गया है। गरियाबंद जिले के मैनपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत पुलिस ने कार्रवाई को अंजाम दिया है। पुलिस ने राजाडेरा जंगल में जमीन के भीतर छिपाकर रखे गए 21 लाख रुपये निकालने पहुंचे तीन लोगों को को धर दबोचा है, जिसमें दो आत्मसमर्पित महिला नक्सली भी शामिल हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2024 के दौरान कुख्यात नक्सली कमांडर चलपति ने क्षेत्र के ठेकेदारों और आम नागरिकों को डरा-धमकाकर अवैध वसूली के जरिए भारी मात्रा में धन एकत्र किया था। इस प्रकार जुटाई गई कुल इक्कीस लाख रुपये की नकदी को राजाडेरा पहाड़ी के पास स्थित घने जंगल में जमीन के भीतर सुरक्षित छिपाकर रख दिया गया था। लंबे समय तक यह रकम वहीं दबी रही, लेकिन हाल ही में जब इन पैसों को निकालने की साजिश रची गई, तब जाकर इस पूरे मामले का खुलासा हुआ।
पुलिस ने बताया कि पकड़ी गई दोनों महिला आरोपियों ने सुकमा पुनर्वास शिविर में रहने के दौरान अपने पुराने परिचित और सहयोगी नोहर मरकाम से संपर्क साधा था। इसके बाद योजनाबद्ध तरीके से तीनों राजाडेरा जंगल पहुंचे और जमीन खोदकर वहां छिपाए गए रुपयों से भरा बैग निकालकर वापस लौट रहे थे। तभी मुखबिर से मिली सटीक सूचना के आधार पर मैनपुर पुलिस ने तुरंत इलाके की घेराबंदी कर ली। पुलिस को देखकर आरोपियों ने छिपने का असफल प्रयास किया, लेकिन सतर्क जवानों ने उन्हें दबोच लिया।
पुलिस की गिरफ्त में आए आरोपियों की पहचान सिंगे उर्फ रोशनी (निवासी गामगुलाबर, सुकमा), बुधरी मुचाकी उर्फ सोनी (निवासी एटागुड़ा, सुकमा) और नोहर मरकाम (निवासी भूतबेड़ा, मैनपुर) के रूप में हुई है। इनमें सिंगे उर्फ रोशनी माओवादी कमांडर चलपति की गार्ड रह चुकी है, जबकि बुधरी मुचाकी सीएनएम दलम की पूर्व कमांडर बताई जा रही है। पुलिस ने इनके कब्जे से 21 लाख रुपये नकद, तीन मोबाइल फोन और एक टीवीएस मोटरसाइकिल बरामद की है। हैरान करने वाली बात यह थी कि नोटों की गड्डियों को टिफिन के अंदर रखकर बैग में छिपाया गया था।
पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ कड़े गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए (UAPA) के तहत गंभीर अपराध दर्ज किया है। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि आत्मसमर्पण और पुनर्वास के बाद भी ये आरोपी किस प्रकार पुराने माओवादी नेटवर्क के संपर्क में थे और इस रकम के इस्तेमाल का उनका असल मकसद क्या था। इस घटना ने एक बार फिर आत्मसमर्पित नक्सलियों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखने की आवश्यकता को रेखांकित कर दिया है।