नईदुनिया प्रतिनिधि, गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के धमतरी और गरियाबंद जिले में फैले उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व (यूएसटीआर) के कोर क्षेत्र में वनों की अंधाधुंध कटाई और अवैध कब्जे का मामला उजागर हुआ है। रिजर्व के करका क्षेत्र में वरिष्ठ वन अधिकारियों के हालिया निरीक्षण के दौरान सामने आया कि लगभग 30 हेक्टेयर से अधिक सघन वन क्षेत्र को खेती के लिए उजाड़ दिया गया है।
जांच में खुलासा हुआ कि पेड़ों को सीधे कुल्हाड़ी से काटने के बजाय एक सुनियोजित साजिश के तहत 'गर्डलिंग' प्रक्रिया से धीरे-धीरे सुखाकर नष्ट किया जा रहा है। इस गंभीर स्थिति ने न केवल वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पर्यावरणविदों और वन्यजीव प्रेमियों की चिंता भी बढ़ा दी है।
गर्डलिंग तकनीक से पेड़ों को सुखाने का खेल
वन अधिकारियों की जांच में पाया गया कि करका क्षेत्र में साल, बीजा और तेन्दू जैसी बेशकीमती प्रजातियों के 2,500 से अधिक विशालकाय पेड़ों की छाल को गोलाई में छील दिया गया। विज्ञान की भाषा में इस प्रक्रिया को गर्डलिंग कहा जाता है, जिसके कारण तने से पत्तियों तक पोषक तत्वों और पानी की आपूर्ति पूरी तरह बंद हो जाती है और पेड़ धीरे-धीरे सूखकर मर जाते हैं।
अतिक्रमित क्षेत्र में कम हुआ घनत्व
उप निदेशक वरुण जैन के अनुसार, निकटवर्ती सामान्य वन क्षेत्रों में प्रति हेक्टेयर पेड़ों का घनत्व 1,500 से अधिक है, जबकि अतिक्रमित क्षेत्र में यह घटकर मात्र 50 से 100 पेड़ प्रति हेक्टेयर रह गया है। इसरो (ISRO) के उपग्रह चित्रों के अध्ययन से पता चला है कि पिछले एक दशक में ग्रामीणों ने खेती के विस्तार के लिए इस संरक्षित वन से लगभग 30,000 पेड़ कथित तौर पर नष्ट कर दिए हैं। 2016 की तस्वीरों में जो क्षेत्र अत्यंत घना नजर आता था, वहीं 2017 के चित्रों में गर्डलिंग के कारण वन आवरण में भारी गिरावट दर्ज की गई।
चार दशक पुराना सोंढूर बांध विस्थापन विवाद
यह विवादित इलाका ऐतिहासिक रूप से तत्कालीन सीतानदी अभयारण्य में सोंढूर बांध के जलग्रहण क्षेत्र में स्थित करका वन ग्राम का हिस्सा है। 1980 के दशक में बांध निर्माण के दौरान इस गांव के निवासियों को पुनर्वासित किया गया था। विभागीय रिकॉर्ड बताते हैं कि जल संसाधन विभाग द्वारा उस समय 55 ग्रामीणों को विधिवत मुआवजा वितरित किया गया था।
वर्ष 2023 में सेटेलाइट की तस्वीरों में दिखता पेड़ काटे जाने का इलाका।
ग्रामीणों का दावा 32 परिवारों को नहीं मिला मुआवजा
इसके विपरीत, वहां काबिज ग्रामीणों का दावा है कि लगभग 32 परिवारों को कभी कोई राहत या मुआवजा नहीं मिला, जिसके चलते वे वहीं डटे रहे। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग ने उन्हें रिजर्व से हटने के लिए पांच एकड़ जमीन और 15 लाख रुपये का प्रस्ताव दिया था, जिसे अस्वीकार करने पर अब उन पर अतिक्रमणकारी होने का आरोप मढ़ा जा रहा है। ग्राम सभा फेडरेशन के अध्यक्ष ईश्वरी लाल नेताम ने भी स्वीकार किया कि पेड़ों को गर्डलिंग कर सुखाया गया है, लेकिन नुकसान का आंकड़ा विभागीय दावे से कम है।
वर्ष 2016 में सेटेलाइट की तस्वीरों में पेड़ काटे जाने का इलाका ज्यादा हरा भरा दिखता हुआ।
वन संसाधन अधिकार का दुरुपयोग
वहीं, वन विभाग का तर्क है कि 2020 में ग्रामीणों को 2,208 हेक्टेयर में सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (सीएफआरआर) जंगल की सुरक्षा और संरक्षण के लिए दिए गए थे, लेकिन इसके बदले बड़े पैमाने पर विनाश किया जा रहा है।
हाथी कॉरिडोर और वन्यजीवों पर बढ़ता संकट
करका क्षेत्र टाइगर रिजर्व के भीतर वन्यजीवों के आवागमन का एक अत्यंत संवेदनशील और प्रमुख प्राकृतिक गलियारा है। यह क्षेत्र हाथियों की नियमित आवाजाही के लिए जाना जाता है। संरक्षित क्षेत्र में वनों के इस स्तर पर विनाश और मानवीय दखल से हाथी कॉरिडोर बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। विशेषज्ञों और अधिकारियों का मानना है कि यदि इस प्राकृतिक पर्यावास का इसी प्रकार क्षरण होता रहा, तो क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं अप्रत्याशित रूप से बढ़ सकती हैं, जिससे ग्रामीणों और हाथियों दोनों के जीवन पर गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा।
डीजीपीएस ड्रोन सर्वे और लापरवाह कर्मियों पर जांच
22 सितंबर को फील्ड असेसमेंट के दौरान वन विभाग की टीम को ग्रामीणों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए हाल ही में पुलिस बल की मौजूदगी में डीजीपीएस समर्थित ड्रोन से हाई-रिज़ॉल्यूशन मैपिंग कराई गई है। इन आंकड़ों की तुलना इसरो के उपग्रह चित्रों से की जा रही है ताकि क्षति का सटीक मूल्यांकन हो सके।
जल्द जारी किया जाएगा नोटिस
प्रशासन अब चिह्नित आरोपियों के नाम प्रारंभिक अपराध रिपोर्ट (पीओआर) में जोड़कर धारा 80ए के तहत बेदखली नोटिस जारी करने की तैयारी में है। इसके अतिरिक्त, मामले की जानकारी होने के बावजूद 20-25 दिनों तक एफआईआर दर्ज न करने के संदेह में बीट गार्ड और रेंज सहायक के विरुद्ध विभागीय जांच भी शुरू कर दी गई है। उल्लेखनीय है कि सीमित संसाधनों और 65 फीसदी रिक्त पदों के बावजूद यूएसटीआर प्रशासन पिछले चार वर्षों में 1,050 हेक्टेयर वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त करा चुका है।