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झीरम कांड के फैसले को चुनौती देगा आदिवासी समाज, हाई कोर्ट के वकीलों से मिलने की तैयारी, घर-घर से जुटाएंगे चंदा

सर्व आदिवासी समाज ने झीरम घाटी कांड में एनआईए कोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया है। समाज का आरोप है कि मामले ...और पढ़ें

By Vinod SinghEdited By: Paritosh Dubey
Publish Date: Sat, 19 Sep 2026 04:24:23 PM (IST)Updated Date: Sat, 19 Sep 2026 04:31:35 PM (IST)
झीरम कांड के फैसले को चुनौती देगा आदिवासी समाज, हाई कोर्ट के वकीलों से मिलने की तैयारी, घर-घर से जुटाएंगे चंदा
परपा के कोया भवन में बैठक के बाद बाहर आते सर्व आदिवासी समाज के प्रतिनिधि। - आयोजक

HighLights

  1. एनआईए कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील
  2. कानूनी खर्च के लिए हर परिवार से बीस रुपये चंदा
  3. मुख्य साजिशकर्ताओं की दोबारा जांच की पुरजोर मांग

नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी माओवादी हमले को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मी तेज हो गई है। हाल ही में एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) की विशेष अदालत ने 10 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। फैसले के बाद सर्व आदिवासी समाज ने एनआईए कोर्ट के फैसले को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में चुनौती देने का निर्णय लिया है। आवश्यकता पड़ने पर इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) तक ले जाने की भी बात कही गई है।

शुक्रवार को जगदलपुर के परपा स्थित कोया समाज भवन में बस्तर संभाग के छह जिलों के प्रतिनिधियों और सजा पाने वाले आरोपियों के परिजनों की बैठक आयोजित की गई। करीब तीन घंटे तक चली इस बैठक में दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, कोंडागांव और बस्तर जिलों के प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक में मुख्य रूप से झीरम मामले की साजिश, संदिग्धों की भूमिका, एनआईए कोर्ट के फैसले और आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों को मिल रहे पुनर्वास लाभों का पुनर्मूल्यांकन करने जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई।


निर्दोष आदिवासियों को फंसाने का दावा

सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने जानकारी दी कि जिन 10 ग्रामीणों को इस मामले में आरोपी बनाया गया है, उनके परिजनों ने बैठक में दावा किया है कि उनके परिवार के सदस्य इस घटना में शामिल नहीं थे और उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया है। समाज का मानना है कि इस भीषण घटना के पीछे की असली और गहरी साजिश की परतें अभी तक पूरी तरह से सामने नहीं आ पाई हैं। तेलंगाना और आंध्रप्रदेश के माओवादियों की मुख्य भूमिका की ओर इशारा करते हुए समाज ने कहा कि स्थानीय छोटे कैडरों को सजा भुगतनी पड़ रही है, जबकि असली मास्टरमाइंड बच निकले हैं।

कानूनी लड़ाई के लिए चंदे की पहल

हाईकोर्ट और आवश्यकता पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट में मजबूत कानूनी पैरवी के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने का भी निर्णय लिया गया है। समाज के पारंपरिक मुखियाओं यानी मुड़ादारों के जिम्मे यह काम सौंपा गया है, जो गांव-गांव जाकर हर चूल्हे (परिवार) से 20-20 रुपये का सहयोग चंदे के रूप में इकट्ठा करेंगे। इस राशि का उपयोग वकीलों की फीस और अन्य कानूनी खर्चों को पूरा करने के लिए किया जाएगा। समाज ने स्पष्ट किया है कि सोमवार को हाईकोर्ट के व रिष्ठ अधिवक्ताओं से मुलाकात कर आगे की कानूनी रणनीति को अंतिम रूप दिया जाएगा।

कांग्रेस की रणनीति और आगामी बैठक

दूसरी ओर, इस मामले को लेकर प्रदेश कांग्रेस कमेटी भी सक्रिय हो गई है। रायपुर स्थित राजीव भवन में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की अध्यक्षता में बुलाई गई है। इसमें नेता प्रतिपक्ष, पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व उपमुख्यमंत्री, झीरम के शहीद परिवारों के सदस्य, घायल और विधि विशेषज्ञ शामिल हो रहे हैं। कांग्रेस इस मामले के कानूनी पहलुओं और भविष्य की राजनीतिक व सामाजिक रणनीति पर मंथन कर रही है।