
नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। बस्तर की समृद्ध लोक-आस्था और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक ऐतिहासिक 'कुटुंब जात्रा' विधान शनिवार को पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। गीदम रोड स्थित महात्मा गांधी स्कूल परिसर में आयोजित इस धार्मिक समागम में संभाग के 84 परगनों और सीमावर्ती क्षेत्रों से पहुंचे 1700 से अधिक देवी-देवताओं के प्रतीकों को पारंपरिक विधि-विधान से विदाई दी गई। ग्रामीण आंगा देव को कंधों पर लेकर पारंपरिक धुनों पर थिरकते रहे, वहीं छत्र और डोलियों के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।
दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी कृष्ण कुमार पाढ़ी के अनुसार, बस्तर में सभी देवी-देवताओं का अपना एक विस्तृत परिवार यानी 'कुटुंब' होता है। दशहरा पर्व के दौरान विभिन्न गांवों और अंचलों के ग्राम्य देवी-देवता एक मंच पर एकत्र होते हैं और उत्सव में सहभागिता के बाद सम्मानपूर्वक विदा होते हैं। नारायणपुर, बड़े डोंगर, छोटे डोंगर और दक्षिण बस्तर के सुदूर वनांचलों से पहुंचे आंगा देव और देव-छत्रों का यह मिलन सैकड़ों गांवों की सामाजिक समरसता को प्रदर्शित करता है।
समारोह के दौरान पूर्व बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने पारंपरिक रूप से लोगों की समस्याएं सुनीं और बच्चों को आशीर्वाद दिया। इसके बाद प्रधान पुजारी ने एक घंटे तक चले विशेष पूजा-विधान को संपन्न कराया। देवताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए सात मोंगरी मछलियां अर्पित की गईं और चना न्योछावर किया गया। मन्नत पूरी होने पर भक्तों ने पारंपरिक रूप से भेंट अर्पित की। पूरे आयोजन के दौरान 27 वर्षों से सेवाएं दे रहे जगत दास की 'करनाल' वाद्ययंत्र की पारंपरिक ध्वनि गूंजती रही।
गौरतलब है कि इस वर्ष बस्तर दशहरा की शुरुआत 12 अगस्त को मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में 'पाट जात्रा' विधान से हुई थी। इसके बाद रथ परिक्रमा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी और मुरिया दरबार जैसे महत्वपूर्ण पड़ाव पूरे हुए। अब 27 अक्टूबर को मां दंतेश्वरी की 'विराई' के साथ देवी की डोली और छत्र को विदा किया जाएगा, जिसके साथ ही 75 दिनों से अधिक चलने वाले इस महापर्व का विधिवत समापन होगा।