
नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर माने जाने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव की पहली रस्म 'पाटजात्रा' से जुड़ी खास और पुरानी परंपरा फिर से जीवंत हो उठी है। ग्राम बिलोरी के ग्रामीण रविवार को जंगल से साल लकड़ी का विशेष गोला लेकर जगदलपुर पहुंचे।
पिछले दस वर्षों से यह लकड़ी ट्रैक्टर के माध्यम से लाई जा रही थी, लेकिन इस बार ग्रामीणों ने पुरानी परंपरा का पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन करते हुए बैलगाड़ी खींचते हुए पूरे सात किलोमीटर की लंबी दूरी तय की। बैलगाड़ी खींचने के दौरान ग्रामीणों और विशेषकर युवाओं का उत्साह चरम पर था, और 'जय मां दंतेश्वरी' के जयकारों के साथ पूरा जनसमूह बैलगाड़ी के पीछे-पीछे चल रहा था।
आगामी 12 अगस्त को राजमहल के समीप स्थित माता दंतेश्वरी मंदिर के पास पारंपरिक पूजा-विधान के साथ 75 दिनों तक चलने वाले इस अनूठे बस्तर दशहरा उत्सव का औपचारिक शुभारंभ हो जाएगा। इस उत्सव के लिए लकड़ी लाने की जिम्मेदारी परंपरा के अनुसार ग्राम बिलोरी को सौंपी गई है।
संपत पुजारी ने जानकारी दी कि लगभग छह फीट लंबी और तीन फीट परिधि वाली इस लकड़ी को स्थानीय भाषा में 'ठुरलु खोटला' कहा जाता है, जिसकी विधिवत पूजा-अर्चना के साथ ही दशहरा पर्व की शुरुआत होती है। पटेल पुनऊराम ने बताया कि इस बार सभी ग्रामीणों ने मिलकर यह दृढ़ संकल्प लिया था कि वे ट्रैक्टर के बजाय बैलगाड़ी में ही ठुरलु खोटला लेकर मां दंतेश्वरी की सेवा-आराधना को समर्पित इस महान पर्व में शामिल होंगे।
बस्तर दशहरा की परंपराओं को लेकर समाज के हर वर्ग में गहरा उत्साह देखने को मिला। कोटवार संतो कश्यप का कहना था कि बस्तर दशहरा की अनूठी परंपरा ही इसकी असल पहचान है, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजना बेहद जरूरी है और इस बार इसे पूरी भव्यता से निभाया गया है। वहीं, बुजुर्ग लखूराम कश्यप भी इस बात से बेहद प्रसन्न नजर आए कि बस्तर के सभी मूल समाज के लोग आपसी एकजुटता के साथ इस भव्य उत्सव को मनाते हैं।
12 अगस्त: पाट जात्रा पूजा विधान
24 सितंबर: डेरी गड़ाई पूजा विधान
10 अक्टूबर: काछनगादी पूजा विधान
11 अक्टूबर: कलश स्थापना पूजा विधान
12 अक्टूबर: जोगी बैठाई पूजा विधान
13 से 18 अक्टूबर: नवरात्रि पूजा एवं रथ परिक्रमा पूजा
18 अक्टूबर: बेल पूजा / फूल रथ परिक्रमा
19 अक्टूबर: महाअष्टमी पूजा, निशा जात्रा पूजा
20 अक्टूबर: कुंवारी पूजा, जोगी उठाई, मावली परघाव
21 अक्टूबर: भीतर रैनी पूजा, रथ परिक्रमा
22 अक्टूबर: कुम्हड़कोट पूजा, रथ यात्रा पूजा
23 अक्टूबर: काछन जात्रा, मुरिया दरबार
24 अक्टूबर: कुटुंब जात्रा, गंगामुंडा पूजा, विदाई पूजा
27 अक्टूबर: मां दंतेश्वरी, दंतेवाड़ा की विदाई पूजा के साथ दशहरा उत्सव का समापन