
नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा के पावन अवसर पर सिरहासार भवन के सामने विशाल विजय रथ निर्माण के अंतर्गत शनिवार को पारंपरिक नार फोड़नी रस्म पूरी श्रद्धा और विधान के साथ संपन्न की गई। यह अनुष्ठान रथ के काष्ठ पहियों को परिचालन योग्य और सुदृढ़ बनाने की दिशा में सबसे अहम पड़ाव माना जाता है। इस विधान के पूर्ण होते ही अब आठ पहियों वाले दुमंजिला रथ को अंतिम रूप देने के कार्य में तेजी आ गई है।
बस्तर दशहरा की परंपरा के अनुसार रथ केवल लकड़ी का सामान्य ढांचा नहीं, बल्कि लोक आस्था, अनूठी काष्ठ कला और सामुदायिक सहभागिता का जीवंत प्रतीक है। नार फोड़नी रस्म के तहत पारंपरिक कारीगर पहियों के केंद्र में छेद करने से पहले विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। इसके उपरांत छेद में लोहे का विशेष गुर्दा लगाया जाता है। यह धातु का हिस्सा विशालकाय पहियों को परिक्रमा के दौरान अत्यधिक दबाव सहने और लंबे समय तक सुचारू रूप से घूमने की मजबूती प्रदान करता है।
इस वर्ष ऐतिहासिक बस्तर दशहरा के लिए आठ पहियों वाला भव्य दुमंजिला विजय रथ तैयार किया जा रहा है। इसे आकार देने में झार उमरगांव और बेड़ा उमरगांव के लगभग 150 कुशल पारंपरिक कारीगर दिन-रात जुटे हुए हैं। रथ निर्माण की इस प्राचीन विधा में बढ़ई और लोहारों का पारंपरिक हुनर देखते ही बनता है। पहियों की ढलाई, लोहे के कलपुर्जे जोड़ने से लेकर विशाल ढांचे को सुरक्षित स्वरूप देने तक हर चरण में इन जनजातीय कारीगरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रहती है।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 13 अक्टूबर को नवरात्रि पूजा के साथ सिरहासार चौक से दैनिक रथ परिक्रमा का शुभारंभ होगा, जो 18 अक्टूबर तक अनवरत चलेगा। इसके पश्चात 21 अक्टूबर को भीतर रैनी और 22 अक्टूबर को बाहर रैनी के ऐतिहासिक विधान आयोजित होंगे। ये दोनों दिन बस्तर दशहरा के सबसे प्रमुख और रोमांचक पड़ाव माने जाते हैं, जिसमें हजारों जनजातीय और स्थानीय श्रद्धालु उत्साहपूर्वक विशाल रथ खींचकर अपनी पारंपरिक आस्था प्रकट करते हैं।
बस्तर दशहरा दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला लोकपर्व है, जो सावन माह की हरेली अमावस्या से शुरू होकर आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तक कुल 75 दिनों तक अनवरत चलता है। 13वीं शताब्दी में महाराजा पुरुषोत्तम देव द्वारा शुरू किए गए इस पर्व में रावण का वध नहीं होता, बल्कि यह मां दंतेश्वरी, प्रकृति और जनजातीय परंपराओं का उत्सव है।
पहला दिन: पाट जात्रा (सावन हरेली अमावस्या)
पर्व की विधिवत शुरुआत: 75 दिवसीय दशहरा पर्व का औपचारिक शुभारंभ इसी दिन होता है।
लकड़ी पूजा विधान: बस्तर के जंगलों से लाई गई साल वृक्ष की पहली पवित्र लकड़ी 'ठुरलू खोटला' की सिरहासार भवन के सामने पूजा की जाती है।
संकल्प: इसी लकड़ी से विशाल रथ निर्माण का संकल्प लिया जाता है।
दूसरा चरण: डेरी गड़ाई (भाद्रपद शुक्ल द्वादशी)
स्तंभ स्थापना: पाट जात्रा के लगभग 40-42 दिन बाद सिरहासार चौक पर साल वृक्ष की हरी शाखा (डेरी/खंभ) गाड़कर पूजा की जाती है।
रथ निर्माण का आरंभ: इस दिन से झार उमरगांव और बेड़ा उमरगांव के पारंपरिक बढ़ई और लोहार कारीगर विशाल काष्ठ रथ का निर्माण शुरू करते हैं।
तीसरा चरण: काछनगादी (आश्विन कृष्ण अमावस्या - पितृमोक्ष अमावस्या)
अनुमति विधान: मिरगान जाति की एक नाबालिग कुंवारी कन्या पर कांटेदार बेल की झाड़ियों से बने झूले (काछन आसन) पर देवी काछिन का आह्वान किया जाता है।
पर्व की अनुमति: बालिका से दशहरा पर्व को निर्विघ्न संपन्न कराने की औपचारिक आज्ञा ली जाती है।
चौथा चरण: कलश स्थापना और जोगी बिठाई (आश्विन शुक्ल प्रतिपदा)
तपस्या का संकल्प: नवरात्र के पहले दिन सिरहासार भवन में एक गहरा गड्ढा खोदकर हलबा समुदाय का प्रतिनिधि (जोगी) 9 दिनों के लिए मौन और निराहार साधना में बैठता है।
क्षेत्र की खुशहाली: यह तपस्या बस्तर क्षेत्र की शांति, सुरक्षा और समृद्धि के उद्देश्य से की जाती है।
पांचवां चरण: रथ परिक्रमा / फूल रथ (आश्विन शुक्ल द्वितीया से सप्तमी)
दैनिक परिक्रमा: चार पहियों वाले 'फूल रथ' पर मां दंतेश्वरी का छत्र स्थापित किया जाता है।
श्रद्धालुओं द्वारा परिचालन: 6 दिनों तक प्रतिदिन शाम को हजारों श्रद्धालु पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर रथ को खींचकर जगदलपुर नगर की परिक्रमा कराते हैं।
छठा चरण: बेल न्योतना और निशा जात्रा (आश्विन शुक्ल सप्तमी व अष्टमी)
बेल न्योतना: आश्विन शुक्ल सप्तमी को जंगल में जाकर बेल के वृक्ष को पूजा के लिए आमंत्रित किया जाता है।
निशा जात्रा (महाअष्टमी की मध्यरात्रि): तांत्रिक विधानों के अनुसार विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मध्यरात्रि में पूजा संपन्न कर क्षेत्र को नकारात्मक शक्तियों से मुक्त रखने की प्रार्थना होती है।
सातवां चरण: जोगी उठाई और मावली परघाव (आश्विन शुक्ल नवमी)
जोगी उठाई: 9 दिनों की कठिन तपस्या पूरी होने पर जोगी को ससम्मान गड्ढे से बाहर निकाला जाता है और उनका नागरिक अभिनंदन होता है।
मावली परघाव: दंतेवाड़ा के शक्तिपीठ से मां दंतेश्वरी और मां मावली की छत्र व पालकी जगदलपुर पहुंचती है। बस्तर राजपरिवार और हजारों स्थानीय निवासी राजकीय सम्मान के साथ उनकी भव्य अगवानी (परघाव) करते हैं।
आठवां चरण: भीतर रैनी (आश्विन शुक्ल दशमी - विजयादशमी)
विजय रथ परिचालन: आठ पहियों वाले विशाल दुमंजिला विजय रथ की परिक्रमा की जाती है।
रथ अपहरण की अनूठी परंपरा: मध्यरात्रि में बस्तर की भतरा और मुरिया जनजातियों के लोग परंपरा अनुसार रथ को "चुराकर" शहर से दूर कुम्हड़ाकोट के घने जंगलों में छिपा देते हैं।
नौवां चरण: बाहर रैनी और नवाखाई (आश्विन शुक्ल एकादशी)
मान-मनौव्वल: राजपरिवार और प्रशासनिक प्रतिनिधि कुम्हड़ाकोट पहुंचते हैं।
सामुदायिक भोज (नवाखाई): जंगलों में एकत्र आदिवासियों के साथ नए धान के चावल का भोजन (नवाखाई) किया जाता है। मान-मनौव्वल के बाद आदिवासी खुशी-खुशी रथ को वापस खींचकर सिरहासार लाते हैं।
दसवां चरण: मुरिया दरबार (आश्विन शुक्ल द्वादशी)
जनजातीय संसद: सिरहासार भवन में एक विशाल लोक पंचायत आयोजित होती है।
समस्या निवारण: बस्तर के सभी परगनों के मांझी, मुखिया, चालकी और मेम्बर राजा व प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष अपने क्षेत्र की समस्याएं और सुझाव रखते हैं, जिन पर तत्काल निर्णय लिए जाते हैं।
अंतिम चरण: काछन जात्रा और ओहाड़ी (आश्विन शुक्ल त्रयोदशी - 75वां दिन)
काछन जात्रा: देवी काछिन को पर्व के सफल आयोजन के लिए धन्यवाद अर्पित किया जाता है।
ओहाड़ी (भावभीनी विदाई): दंतेवाड़ा से आई मां मावली की डोली और बस्तर के कोने-कोने से पधारे सैकड़ों ग्राम-देवी-देवताओं को पारंपरिक सम्मान, वस्त्र और भेंट देकर सजल नेत्रों से विदा किया जाता है।
इस प्रकार लगातार 75 दिनों तक चलने वाला यह अनूठा पर्व सामाजिक समरसता, प्रकृति पूजा और जनजातीय लोकतंत्र की मिसाल पेश करते हुए संपन्न होता है।