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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 02, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

शिक्षा की ललक: हाथ नहीं करते काम तो पांव से लिखकर दी परीक्षा, सपना है IAS बनना

साल दर साल वह एक-एक कर परीक्षा उत्तीर्ण करते हुए अब हाईस्कूल पहुंच चुकी है। वर्षों के अभ्यास से वह इतनी पारंगत हो चुकी है कि उसकी लिखावट किसी सामान्य ...और पढ़ें

By Shashank Shekhar BajpaiEdited By: Shashank Shekhar Bajpai
Publish Date: Wed, 02 Apr 2025 01:45:35 PM (IST)Updated Date: Wed, 02 Apr 2025 01:45:35 PM (IST)
शिक्षा की ललक: हाथ नहीं करते काम तो पांव से लिखकर दी परीक्षा, सपना है IAS बनना
नानगुर सेजस स्कूल की बालिका राखी वार्षिक परीक्षा में अपने पांव से प्रश्नों के उत्तर लिखती हुई।

HighLights

  1. जन्म से ही दिव्यांग राखी नाग नौवीं की दे रही परीक्षा।
  2. बच्ची की लिखावट सामान्य बच्चे से नहीं है कमतर।
  3. माता-पिता ने गरीबी को शिक्षा में नहीं बनने दिया बाधा।

अनिमेष पाल, ‌जगदलपुर। ‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मानव की अदम्य दृढ़ता और कभी हार ना मानने वाले भाव को समेटे इस कविता को चरितार्थ कर दिखाया है, बस्तर की आदिवासी बेटी राखी नाग ने।

सोमवार को राखी नौंवी कक्षा की परीक्षा देते हुए नानगुर के स्वामी आत्मानंद विद्यालय में मिली। राखी विलक्षण है। जन्म से ही दिव्यांग होने के बाद भी उसकी शिक्षा के प्रति ऐसी ललक है कि जन्म से ही उसके हाथ काम नहीं करते हैं, तो उसने पांव से लिखना शुरू कर दिया।


साल दर साल वह एक-एक कर परीक्षा उत्तीर्ण करते हुए अब हाईस्कूल पहुंच चुकी है। वर्षों के अभ्यास से वह इतनी पारंगत हो चुकी है कि उसकी लिखावट किसी सामान्य बच्चे से कमतर नहीं है। राखी का परिवार कैकागढ़ पंचायत के बेंगलुरु गांव में रहता है।

पढ़ाई में बाधा नहीं गरीबी

उसके पिता धनसिंह नाग एक निजी गैस एजेंसी के लिए साइकिल से गांव–गांव घूमकर गैस सिलेंडर की डिलीवरी करते हैं। माता चैती घरेलू महिला है और इमली, महुआ जैसे वनोपज संग्रहण से अर्जित आय से घर चलाने में योगदान देती है।

माता–पिता ने निर्धनता को कभी भी राखी की पढ़ाई में बाधा नहीं बनने दिया। हमेशा ही उसे आगे बढ़ने-पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। अब राखी का सपना अपनी पढ़ाई पूरी कर आईएएस अधिकारी बनने का है। वह क्षेत्र के विकास में योगदान देना चाहती है।

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इसके साथ ही वह कहती है उसके माता–पिता ने बढ़ी तकलीफें झेलकर उसे पढ़ा रहे हैं। आगे चलकर वह अपने माता–पिता को एक अच्छा जीवन देने की चाह रखती है।

ट्राइसिकल नहीं, भाई छोड़ता है स्कूल

स्कूल के शिक्षक मांझी ने बताया कि बालिका दोनों हाथ व एक पांव से दिव्यांग है। उसका भाई उसे प्रतिदिन साइकिल पर बिठाकर स्कूल लाता और ले जाता है। अभी जिस ट्राइसिकल पर वह बैठकर परीक्षा दे रही है, वह स्कूल की है।

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उसने सरकार से ट्राइसिकल हासिल करने के लिए आवेदन किया था, लेकिन अभी तक उसे नहीं मिली है। ट्राइसिकल मिलने से वह स्वावंलबी तरीके से स्कूल आ-जा सकेगी। उसकी प्रतिभा विलक्षण है। वह इतनी सारी विषम परिस्थितियों के बाद भी जिंदगी की जंग लड़ रही है।