
नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। बस्तर संभाग के सात जिलों में शातिर ठगों ने आम नागरिकों और सेवानिवृत्त कर्मियों की गाढ़ी कमाई पर डाका डालते हुए 10 करोड़ 61 लाख रुपये से अधिक की चपत लगा दी है। इसके विपरीत चिंताजनक पहलू यह है कि पुलिस अब तक महज 19.62 लाख रुपये की राशि ही वापस करा पाई है, जो कुल ठगी गई रकम का मात्र 1.85 प्रतिशत है।
जनवरी से सितंबर 2026 के आधिकारिक आंकड़े पुलिसिया जांच और तकनीकी दक्षता की धीमी रफ्तार को उजागर करते हैं। नौ महीनों के दौरान संभाग में कुल 117 प्रकरण दर्ज किए गए, जिनमें से सिर्फ 38 मामलों में अदालत में चालान पेश किया जा सका।
सबसे दयनीय स्थिति बस्तर, कांकेर, कोंडागांव और सुकमा जिलों की रही, जहां पुलिस पीड़ितों का एक भी रुपया वापस कराने में नाकाम रही। बस्तर जिले में सर्वाधिक 44 मामले दर्ज हुए और 2.21 करोड़ रुपये लूटे गए, लेकिन रिकवरी शून्य रही।
संभाग में सर्वाधिक 3.30 करोड़ रुपये की ठगी दंतेवाड़ा जिले में दर्ज की गई, जहां 20 मामलों में से 10 में चालान हुए और 7.58 लाख रुपये रिकवर किए गए। वहीं नारायणपुर में 14 मामलों में 5.21 लाख और बीजापुर में 9 मामलों में 6.82 लाख रुपये की रिकवरी हुई। बीजापुर में 'डिजिटल अरेस्ट' का भी एक सनसनीखेज मामला सामने आया, जिसमें एक पीड़ित को डरा-धमकाकर 2.01 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए गए।
साइबर अपराधों की जांच में आड़े आ रही बाधाओं पर विशेषज्ञों का कहना है कि ठग अंतरराज्यीय गिरोहों के जरिए फर्जी सिम और म्यूल बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं। पलक झपकते ही रकम कई खातों और ई-वॉलेट में ट्रांसफर कर ली जाती है। गोल्डन ऑवर में शिकायत न मिलने और दूसरे राज्यों की पुलिस से समन्वय में देरी के चलते रकम को फ्रीज कराना बेहद मुश्किल हो जाता है। पीड़ितों का कहना है कि सिर्फ एफआईआर दर्ज करने के बजाय रिकवरी पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।