
विनोद सिंह। जगदलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि
बस्तर की आदिवासी संस्कृति को ऐसे ही विलक्षण नहीं माना जाता। इनकी संस्कृति में कई ऐसे रीति-रिवाज हैं जो इस समाज को दूसरों से अलग ही नहीं करते बल्कि अध्ययन और शोध का विषय भी बने हुए हैं। बस्तर संभाग में करीब 68 फीसद आदिवासी निवासरत हैं। इन आदिवासियों में कई अलग-अलग जाति और समाज हैं। सबकी संस्कृति और रीति रिवाज में थोड़ा बहुत ही अंतर देखने को मिलता है।
बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले में निवासरत विशेष पिछड़ी जनजाति अबूझमाड़िया भी इन्हीं में से एक है। इनकी संस्कृति में पूर्वजों के प्रति आस्था और विश्वास का काफी गहरा नाता है। इनका पुनर्जन्म पर विश्वास है। इनके निवास (घर) में पूर्वजों के लिए अलग कक्ष होता है। इसे ये अपनी स्थानीय बोली में आनाल कोली कहते हैं। परिवार की सदस्य संख्या के आधार पर भले ही घर में पर्याप्त अथवा आवश्यकता अनुसार कक्ष की संख्या न हो लेकिन पूर्वजों का कक्ष जरूर होता है। यह जनजाति पितृपक्ष को नहीं मानती। इनके लिए पूर्वज भी देवता हैं और हर तीज त्योहार में ये सबसे पहले पूर्वजों को याद कर उनकी पूजा करते हैं। उनके नाम पर भोजन अर्पण करने के बाद ही परिवार के अन्य सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय की अबूझमाड़िया जनजाति के आधारभूत सर्वेक्षण से जुड़ी रिपोर्ट में पूर्वजों के प्रति इनकी आस्था और उन्हें देवतुल्य मानने का स्पष्ट उल्लेख है।
अबूझमाड़ क्षेत्र के निवासी और वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय बकावंड के प्रभारी प्राचार्य भावेश कुमार नेताम के अनुसार इस समाज के लिए पितृपक्ष का समय विशेष मायने नहीं रखता है। हर त्योहार में पूर्वज ही देवता है। हर शुभ अवसर पर हम जो खाते हैं उसे सबसे पहले पूर्वजों के नाम पर अर्पण करते हैं। उन्होंने बताया कि हर घर में एक आनाल कोली (पूर्वजों का कक्ष) होता है। आनाल का तात्पर्य पूर्वजों की आत्मा और कोली का अर्थ कक्ष अथवा कमरा है। इस कक्ष में अड़का (घड़ा) रखा जाता है। मान्यता अनुसार पूर्वजों की आत्मा यहां निवास करती है और परिवार को हर संकट से सुरक्षित रखती है। सहायक प्राध्यापक भावेश ने बताया कि आनाल कोली में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। अब धीरे-धीरे पूर्वजों के इसी कक्ष को अनाज के भंडार गृह के रूप में उपयोग किया जाने लगा है। अबूमाड़िया समाज की मान्यता है कि भरण पोषण के लिए अनाज पूर्वजों के आशीर्वाद से ही मिलता है।
पूर्वजों के नाम पर नामकरण की परंपरा
अबूझमाड़िया जनजाति के आधारभूत सर्वेक्षण से जुड़ी रिपोर्ट में बताया गया है कि इस जनजाति में पैदा होने वाले बच्चों के नामकरण की परंपरा पूर्वजों के नाम पर करने की है। भावेश कुमार नेताम का कहना है कि आधुनिकता का असर इस समाज पर भी पड़ा है। आजकल लोग दूसरे नाम भी रखने लगे हैं लेकिन घर परिवार में संबोधन के लिए अधिकांशतः पूर्वजों का नाम पर ही बच्चे का नाम तय करने की परंपरा है। इससे अबूझमाड़िया समाज की अपने पूर्वजों के प्रति गहरी श्रद्धा और विश्वास का पता चलता है।
प्रकृति के उपासक हैं आदिवासी
स्वर्गीय महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफेसर डा. सपन कोले का कहना है कि हमारे देश में प्रायः हर समाज में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और विश्वास देखने को मिलता है। यह किसी में कम तो किसी में ज्यादा हो सकता है। आदिवासी समाज में यह ज्यादा गहराई लिए हुए है। इनमें कई जनजाति पूर्वजों को देवतुल्य मानती हैं। आदिवासियों की संस्कृति को समृद्ध और विलक्षण इन्हीं कारणों से माना जाता है।