जगदलपुर। भगवान जगन्नाथ के महापर्व रथ यात्रा को बस्तर में गोंचा कहते हैं। यह पर्व यहां 611 वर्षों से मनाया जा रहा है। इन दिनों शहर के छह गर्भगृह वाले भगवान जगन्नाथ मंदिर में 612 वां गोंचा महापर्व प्रारंभ हो चुका है। जिसमें बस्तर राजपरिवार के सदस्यों से लेकर वनांचल में रहने वाले आदिवासी तक शामिल होंगे।

मिली थी रथपति की उपाधि

बस्तर इतिहास के अनुसार बस्तर महाराजा पुरुषोत्तम देव कृष्ण भक्त थे। वर्ष 1408 में लंबी यात्रा कर वे जगन्नाथपुरी पहुंचे थे। देवकृपा से उन्हें रथपति की उपाधि देकर 16 पहियों वाला रथ प्रदान किया गया था। उन दिनों राजधानी बस्तर की सड़कें इतनी अच्छी नहीं थीं कि 16 पहियों वाला रथ सुगमता से खींचा जा सके, इसलिए कालांतर में सुविधा अनुसार 16 पहले वाले रथ को तीन हिस्सों में विभक्त कर दिया गया। चार पहिया वाला पहला रथ गोंचा के अवसर पर खींचा जाता है वही चार पहियों वाला दूसरा रथ बस्तर दशहरा में फूल रथ के नाम से 6 दिनों तक खींचा जाता है। 8 पहियों वाला रथ भीतर तथा बाहर रैनी के दिन खींचा जाता है।

पुजारी भी बस्तर पहुंचे महाराजा पुरुषोत्तम देव भगवान जगन्नाथ की पूजा अर्चना करने के लिए ब्राह्मण परिवारों को भी बस्तर लाए थे, वही 360 आरण्यक ब्राह्मणों को उन्होंने पापड़ाहांडी के राजा से मुक्त कर उन्हें आश्रय दिया था, इसलिए गोंचा आयोजित करने वाले इस समाज को 360 अरण्यक ब्राह्मण समाज कहा जाता है। कालांतर में इस समाज ने भगवान जगन्नाथ की मुख्य गुड़ी के अलावा पांच अन्य जगन्नाथ मंदिरों का निर्माण कराया। इन्हें वासुदेवनाथ, कालेश्वरनाथ, अमात्यश्री, मराठानाथ और कालिकानाथ जगन्नाथ मंदिर कहा जाता है।

रियासत कालीन जेवरात

भगवान जगन्नाथ को प्रतिवर्ष गोंचा के अवसर पर रियासत कालीन चांदी के आभूषणों से अलंकृत किया जाता है । प्रतिवर्ष इन्हें जिला कोषालय से निकाला जाता है और गोंचा निपटने के बाद सुरक्षा के बीच पहुंचा दिया जाता है। इधर अरण्यक ब्राह्मण समाज भी अपने भगवान के लिए 14 किलो वजनी चांदी के आभूषण तैयार करवाया है। इनसे ही भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की विभिन्न मूर्तियों को अलंकृत किया जाता है। कुछ भक्त भी भगवान को आभूषण अर्पित किए हैं, जो समाज के संरक्षण में है।

7 दिवसीय महाभंडारा भगवान जगन्नाथ के प्रसाद को पाने के लिए लोग लालायित रहते हैं इसलिए प्रतिवर्ष 360 ब्राह्मण समाज अमनिया नामक महा भंडारा आयोजित करता है। सात दिनों तक चलने वाले इस महा भंडारा को करीब 150 गांवों में रहने वाले ब्राह्मण समाज के लोग संपन्न कराते हैं। वे ही अपने साथ काफी मात्रा में खाद्य सामग्री लेकर आते हैं और स्वयं इन्हें पका कर भक्तों को बांटते हैं।

सिरहा शहर में अनुष्ठान

गोंचा पर्व के अंतर्गत शहर के ऐतिहासिक सिरहासार भवन को जनकपुर के रूप में संवारा जाता है। यहां भगवान जगन्नाथ आठ दिनों तक विश्राम करते हैं। इस दौरान सिरहासार में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं। यहीं पर प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष सप्तमी के दिन भगवान को छप्पन भोग अर्पित किया जाता है।

तुपकी से भगवान को सलामी रथयात्रा वैसे तो पूरी दुनिया में मनाया जाता है लेकिन बस्तर में इसे गोंचा जाता है और भगवान जगन्नाथ के इस महापर्व के दिन बांस से निर्मित तुपकी चला तथा विशेष प्रकार की आवाज कर भगवान को सलामी दी जाती है इस तरह गोंचा और तुपकी एक दूसरे के पर्याय हो चुके हैं। खासकर बच्चों को तुपकी के कारण ही गोंचा महापर्व का इंतजार रहता है। श्रीगोंचा और बाहूड़ा गोंचा के दिन तुपकी चलाई जाती है।

13 वेशों में भगवान जगन्नाथ शहर के भगवान जगन्नाथ मंदिर की अपनी अलग विशेषता है। यहां भगवान जगन्नाथ के 13 वेशों को स्थापित किया गया है जो काफी दर्शनी है। यह मूर्तियां कोरापुट स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर के एक भक्त के प्रयास से स्थापित हो पाया है। भगवान जगन्नाथ मंदिर आने वाले भक्त आह्लादित होते हैं।