जगदलपुर। कवि वृंद रचित 'वृंद सतसई' का दोहा, करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत-जात ते सिल पर पड़त निशान॥ कभी स्कूलों में प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ाया जाने वाला यह प्रचलित दोहा रहा है।

इस दोहा में अभ्यास की महत्ता बताने कुआं का सहारा लिया गया है। इसका भवार्थ यह है कि कुएं की जगत के पत्थर पर बार-बार रस्सी के आने-जाने की रगड़ से निशान बन जाते हैं, उसी प्रकार लगातार अभ्यास से अल्पबुद्धि अथवा जड़मति भी बुद्धिमान बन जाता है। यदि विद्यार्थी यह कहें कि वह यहां जगदलपुर शहर में किसी पुराने सार्वजनिक कुएं पर जाकर जगत (पत्थर) में रसरी (रस्सी) का निशान देखना चाहते हैं तो कम से कम आज की स्थिति में यहां के प्राचीन कुओं में यह स्थिति नजर नहीं आती है।

शासन-प्रशसान की उपेक्षा की भेंट चढ़ रहे सार्वजनिक कुओं की की दशा बहुत खराब हो चुकी है। नईदुनिया लगातार सार्वजनिक प्राचीन कुओं की दुर्दशा को सामने लाने का प्रयास कर रहा है। शासन-प्रशासन, शहर के स्वयंसेवी संगठनों, पर्यावरणविदों, बुद्धिजीवियों सहित आमजनों का ध्यान आकृष्ट करने के अभियान के तहत चर्चा धरमपुरा मार्ग पर साईं मंदिर के समीप एमपीएम अस्पताल मोड़ पर स्थित प्राचीन कुएं की न हो तो यह इस धरोहर के साथ अन्याय होगा। यहां अब न तो रसरी आवत जात है न सिल पर पड़त निशान है। मुख्यमार्ग के किनारे इस कुएं तक पहुंचने आसपास के लोगों से पूछकर पहुंचना होता है। शहर के पुराने लोग इस कुएं की स्थिति से भलिभांति परिचित हैं लेकिन आज की युवा पीढ़ी में से संभवतः बहुत कम लोग ही इसके बारे में जानते हैं। नईदुनिया बस्तर प्रकृति बचाओ समिति के अध्यक्ष दशरथ कश्यप से कुएं की स्थिति की जानकारी लेकर वहां पहुंचा।

कुआं की स्थिति से साफ है कि इसका उपयोग सालों से नहीं किया जा रहा है। कुआं जर्जर अवस्था को प्राप्त करने की ओर बढ़ रहा है। कुएं के अंदर दीवारों पर और बाहर की ओर घास उग आई हैं तो बताती हैं कि यहां निगम या जिला प्रशासन का अमला लंबे से झांकने नहीं आया है। कुआं का संरक्षण जल्दी नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब शहर के दूसरे कई प्राचीन कुओं की ही तरह इसका भी अस्तित्व मिट जाएगा। यह कुआं कभी लोहंडीगुड़ा की ओर से शहर आनें वाले राहगीरों की प्यास बुझाता था आज इसके ही कंठ प्यासे हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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