हेमंत कश्यप, जगदलपुर ।Jagdalpur भारत को आजाद करने से पहले अंग्रेज बैलाडीला पहाड़ हैदराबाद के निजाम को बेचना चाहते थे । इसका बस्तर की तत्कालीन महारानी प्रफुल्लकुमारी देवी ने विरोध किया था। इस बात से नाराज अंग्रेजों ने उनके पति प्रफुल्लचंद्र भंजदेव को बस्तर छोड़ कोलकाता रहने मजबूर कर दिया। वही महारानी को अपेंडीसाईटिस पीड़ित बताकर लंदन भेज साजिश के तहत मरवा दिया था।
महारानी की अंग्रेज विरोधी नीतियों के कारण ही 35 किलोमीटर लंबा बैलाडीला का पहाड़ आज बस्तर छत्तीसगढ़ राज्य का हिस्सा है और पहाड़ से प्राप्त लौह अयस्क तथा पहाड़ के नीचे बसे समानांतर गांव से टीन अयस्क की खुदाई कर केंद्र और राज्य सरकार को अरबों रुपए का राजस्व प्राप्त हो रहा है। बैलाडीला का पहाड़ अगर निजामों के हाथों चला जाता तो छत्तीसगढ़ में एनएमडीसी के सीएसआर मद के तहत हुए सैकड़ों विकास कार्य नहीं हो पाते।
काकतीय वंश के 19 वें शासक रुद्रप्रताप देव की एकमात्र संतान प्रफुल्ल कुमारी देवी थी। 16 नवंबर 1921 को राजा रूद्रप्रताप देव की मृत्यु हुई। राजा की मृत्यु के समय प्रफुल्लकुमारी देवी की अवस्था मात्र 11 वर्ष थी। बस्तर रियासत में उत्तराधिकार को लेकर बस्तर रियासत के दीवान और ब्रिटिश सरकार धर्म संकट में थे।
बस्तर रियासत के जमींदार, मांझी और जनता प्रफुल्लकुमारी देवी को रानी बनाना चाहते थे। ब्रिटिश सरकार को डर था कि यदि प्रफुल्लकुमारी देवी को रानी नहीं बनाया जाता तो बस्तर में 1910 ईस्वी जैसा विद्रोह हो सकता था।
ब्रिटिश सरकार बाध्य होकर प्रफुल्ल कुमारी देवी को राजगद्दी में बिठाया। 25 जनवरी 1927 को प्रफुल्ल कुमारी देवी का विवाह मयूरभंज के महाराजा दामचंद भंजदेव के पुत्र प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव के साथ हुआ।
रानी संपूर्ण बस्तर में "बॉबी धानी" के नाम से विख्यात थीं। ब्रिटिश सरकार ने प्रफुल्ल कुमारी को प्रसन्न करने के लिए 31 मार्च 1933 को महारानी की उपाधि दी थी। रानी को उपाधि देने के पीछे अंग्रेजों की गहरी साजिश भी थी। वह बैलाडीला का क्षेत्र हैदराबाद के निजाम को बेचना चाहते थे।
अंग्रेजों ने महारानी को खुश करने तथा प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया किंतु रानी बैलाडीला को निजाम के हाथों बेचने तैयार नहीं हुई। इस बात से नाराज होकर अंग्रेजों ने राजा और रानी को प्रतिमाह दिया जाने वाला प्रिवी पर्स 2000 रुपये में कटौती कर प्रतिमाह 1000 रुपये कर दिया।
इतिहासकार स्व जेआर वाल्यानी ने अपनी किताब में उक्ताशय की जानकारी देते हुए लिखते हैं कि उन दिनों राज परिवार के डॉक्टर का वेतन भी 2000 रुपये से अधिक था। रानी ने वेतन संबंधी बातें नागपुर प्रशासन तथा भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलियगो को दी परंतु वायसराय ने रानी के निवेदन की ओर ध्यान नहीं दिया।
इधर बैलाडीला प्रकरण के चलते ब्रिटिश सरकार महारानी से नाराज रहने लगी अंग्रेज डॉ. मिचेल ने यह घोषणा कर दी कि महारानी को अपेंडिसाइटिस हो गया है। उनका इलाज लंदन में ही हो सकता है। डॉक्टर मिचेल के कहने पर महारानी को इलाज हेतु लंदन भेजा गया। वहीं दीवान हाईड ने डॉ मिचेल को एक गोपनीय पत्र लिखा कि महारानी लंदन से जिंदा बस्तर वापस न आ सके। 28 फरवरी 1936 को लंदन में अपेंडिसाइटिस के ऑपरेशन के बाद महारानी का देहावसान हो गया। महारानी की हत्या के पीछे ब्रिटिश सरकार का स्पष्ट हाथ था।
क्या है बैलाडीला
विश्व स्तरीय लौक अयस्क के लिए चर्चित बैलाडीला की पहाड़ियां मुख्य रूप से बेंडेड हेमेटाइट क्वार्ट्जॉयट चट्टानों से बनी है। इस पर्वत श्रृंखला की लंबाई 35 किलोमीटर तथा चौड़ाई नौ किलोमीटर है।
खनिज विभाग से मिली जानकारी के अनुसार इस पर्वत श्रृंखला में 1345. 53 मिलियन टन लौह अयस्क का भंडार है। इसमें लौह तत्व 60 से 68% है। बैलाडीला की पहाड़ियों के नीचे समानांतर बसे गांव में टीन का भंडार है।
उल्लेखनीय है कि संपूर्ण भारत में टीन का भंडार सिर्फ छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा व सुकमा प्रक्षेत्र में है। यहां टीन के साथ नियोलियम और टेंटलम जैसी दुर्लभ धातु का भी भंडार है। बताया गया कि बचेली प्रक्षेत्र में 3540 टन, तोंगपाल प्रक्षेत्र में 2409.5 टन तथा कटे कल्याण इलाके में 13395 टन अयस्क का भंडार है। लौह अयस्क और टीन का उत्खनन पिछले 50 वर्षों से निरंतर जारी है।
जापान का मददगार बैलाडीला
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिराए जाने से जापान तबाह हो गया था।आजादी के बाद भारत से अनुबंध हुआ। जापान को बैलाडीला की खदानों से ही लौह अयस्क की आपूर्ति हुई। इसके लिए जापान सरकार ने किरंदुल से लेकर विशाखापट्टनम तक करीब 525 किलोमीटर लंबी रेल लाइन स्वयं बिछाई। बैलाडीला के लौह आयस्क से ही जापान स्टेपलर, नेल कटर और मोटर गाड़ियों के इंजन जैसी छोटी-छोटी चीजें बनाकर समृद्ध हुआ। जापान आज भी भारत के बहाने बैलाडीला को याद करता है।
महारानी के प्रति अगाध श्रद्धा
बस्तर के रहवासी विभिन्न प्रसंगों में आज भी बस्तर की साहसी महारानी प्रफुल्लकुमारी देवी को याद करते हैं। बस्तर का पहला जिला अस्पताल जगदलपुर में वर्ष 1933 में बनाना शुरू हुआ था। तब महारानी ने सबसे अधिक आर्थिक मदद की थी। उनकी आकस्मिक मौत के बाद यह अस्पताल 1936 में उनके नाम समर्पित कर दिया गया। जो महारानी अस्पताल के नाम से प्रदेश में चर्चित है। यहां उनकी प्रतिमा लगी है। उपचार के लिए आने वाले आदिवासी प्रतिमा को प्रणाम करके ही घर लौटते हैं।