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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 27, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Naxalism in Chhattisgarh: डर का दूसरा नाम डीआरजी...इससे खौफ खाते हैं माओवादी

छत्तीसगढ़ में डीआरजी की टीम नक्सलवाद के खिलाफ बहुत बेहतर प्रदर्शन कर रही है। टीम में स्थानीय आदिवासी और आत्मसमर्पित माओवादी शामिल हैं। इस टीम ने ही मु...और पढ़ें

By Roman TiwariEdited By: Roman Tiwari
Publish Date: Tue, 27 May 2025 08:29:19 PM (IST)Updated Date: Tue, 27 May 2025 08:31:34 PM (IST)
Naxalism in Chhattisgarh: डर का दूसरा नाम डीआरजी...इससे खौफ खाते हैं माओवादी
डीआरजी की टीम का नक्सलवाद के खिलाफ बहुत बेहतर प्रदर्शन

नईदुनिया प्रतिनिधि,जगदलपुर: डर का दूसरा नाम है डीआरजी! इस बल के नाम से ही अब माओवादी खौफ खाते हैं। बस्तर के आत्मसमर्पित माओवादियों व स्थानीय आदिवासी लड़ाकों से बनी डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) बल को रक्षा विशेषज्ञ इस समय गुरिल्ला युद्ध में दुनिया का सबसे मारक बल मानते हैं। पूरे देश में इस समय यह बल चर्चा के केंद्र में है।

सुरक्षा एजेंसियों के पास माओवादी प्रमुख बसव राजू की 45 साल पुरानी एक तस्वीर थी, इसके अलावा एजेंसियां उसकी कोई और तस्वीर नहीं थी। माओवाद से प्रभावित देश के 16 राज्यों की पुलिस भी इस दुर्दांत अपराधी को ढूंढ नहीं पाई, लेकिन इस बल ने अबूझमाड़ में पिछले बुधवार को हुई मुठभेड़ में मार गिराया है।


माओवादियों की पूरी की पूरी कंपनी का सफाया

बता दें कि, इस मुठभेड़ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) महासचिव नंबाला केशव राव के साथ दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी सदस्य नागेश्वर राव उर्फ राजन्ना समेत अन्य 25 माओवादी मारे गए। ये माओवादी पीपुल्स लिब्रेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) कंपनी नंबर-सात के सदस्य थे। पूरी कंपनी को ही डीआरजी ने खत्म कर दिया। पिछले डेढ़ वर्ष में बस्तर में लगभग 440 माओवादी मारे गए हैं। इसमें केंद्रीय सुरक्षा बलों के साथ-साथ डीआरजी बल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

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आत्मसमर्पित माओवादियों की भर्ती से लाभ

दस वर्ष पहले 2015 में पूर्ववर्ती रमन सरकार में बस्तर में माओवादियों के बढ़ते प्रभाव को रोकने डीआरजी बल का गठन किया गया था। नारायणपुर जिले में 600 पदों पर आत्मसमर्पित माओवादियों के साथ स्थानीय बोली-भाषा और भूगोल के जानकार आदिवासियों की भर्ती की गई। स्थानीय आदिवासी होने से इन्हें जंगल में माओवादियों के रास्ते, गतिविधि, आदतें और काम के तरीके व खुफिया तंत्र के साथ ही बोली भाषा की जानकारी थी।

5000 से अधिक का बल, 500 आत्मसमर्पित माओवादी

माओवादी विरोधी अभियान में आत्मसमर्पित माओवादियों को शामिल करने से लाभ मिला। जिसके बाद दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर, कांकेर, कोंडागांव में भी डीआरजी बल गठित किया गया। अब पूरे संभाग में 5000 बल है, जिसमें लगभग 500 आत्मसमर्पित माओवादी हैं। 2019 में इस बल में महिला कमांडो यूनिट की भी स्थापना की गई है। दंतेवाड़ा में 16 महिला कमांडों से शुरू हुए इस यूनिट में अब सभी जिले मिलाकर लगभग 700 महिला कमांडो हैं।

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सफलता के पीछे कड़ा अभ्यास और प्रशिक्षण

डीआरजी जवानों की सफलता के पीछे कड़ा अभ्यास व प्रशिक्षण है। इस बल ने कांकेर स्थित जंगलवार कैंप के साथ आसाम, मिजोरम, तेलंगाना से लेकर कई राज्यों में गुरिल्ला युद्ध का विशेष प्रशिक्षण लिया है। यहां तक की श्रीलंका से भी विशेषज्ञ बुलाकर जवानों को प्रशिक्षण दिया गया है। दंतेवाड़ा पुलिस अधीक्षक गौरव राय कहते हैं कि डीआरजी के जवान या तो अभियान पर होते हैं, या फिर मैदान में। प्रतिदिन 12 घंटे का कड़ा अभ्यास सत्र होता है, ताकि लंबे अभियान में वे थके नहीं। घने जंगल में गर्मी हो या बरसात तीन से चार दिन तक 70 किलो से अधिक वजन के साथ यह बल 100 किमी तक पैदल अभियान करने में सक्षम है।

लंबे अभियान की विशेषज्ञ डीआरजी

डीआरजी में स्थानीय आदिवासी और आत्मसमर्पित माओवादी को शामिल करने से अभियानों में इसका लाभ मिला। वे जंगल-पहाड़ों में रहने के अभ्यस्त होने के साथ ही उनकी कद-काठी भी यहां के जंगलों के अनुकूल है। कड़े प्रशिक्षण और आधुनिक हथियार से लैस यह बल अब गुरिल्ला युद्ध में सबसे दक्ष बल बन चुका है।