
नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। एक और सपना परीक्षा के परिणाम के दबाव में टूट गया। डाक्टर बनने की उम्मीद लिए तीन बार नीट परीक्षा देने वाली 20 वर्षीय छात्रा आखिरकार असफलता का बोझ नहीं झेल सकी। बोधघाट थाना क्षेत्र के आड़ावाल में रहने वाली छात्रा ने शुक्रवार देर रात अपने कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। प्रारंभिक जांच में पुलिस ने नीट परीक्षा में लगातार असफलता से तनाव में होने की बात कही है।
पुलिस के अनुसार आड़ावाल निवासी सुरला द्वारिका राव नायडू (20), पिता सतीश राव नायडू, लंबे समय से मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही थी। उसने लगातार तीन बार नीट की परीक्षा दी, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी। शुक्रवार रात उसने अपने कमरे में फांसी लगा ली। शनिवार तड़के स्वजन उसे अचेत अवस्था में महारानी अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
नगर पुलिस अधीक्षक (डीएसपी) सुमित कुमार धोत्रे ने बताया कि प्रारंभिक जांच में छात्रा के परीक्षा परिणाम को लेकर मानसिक तनाव में होने की जानकारी मिली है। हालांकि पुलिस सभी पहलुओं से जांच कर रही है। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं का दबाव अब युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रहा है। सफलता की तीव्र अपेक्षा, सामाजिक तुलना और भविष्य को लेकर बढ़ती चिंता कई बार विद्यार्थियों को अकेलेपन और निराशा की ओर धकेल देती है।
मनोचिकित्सक डा. वत्सला कहती हैं कि प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता को कई विद्यार्थी अपनी पूरी पहचान और भविष्य से जोड़ लेते हैं, जबकि यह केवल एक परीक्षा का परिणाम होता है। ऐसे समय में परिवार को बच्चों के व्यवहार में आए बदलावों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि छात्र लगातार उदास रहे, लोगों से दूरी बनाने लगे, नींद या भूख में बदलाव आए या निराशा की बातें करे, तो इसे सामान्य तनाव मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय रहते खुलकर बातचीत, भावनात्मक सहयोग और आवश्यकता पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श कई गंभीर परिस्थितियों को टाल सकता है। हर असफलता के बाद नए अवसर होते हैं और किसी परीक्षा का परिणाम किसी व्यक्ति का मूल्य तय नहीं करता।