
जगदलपुर (ब्यूरो)। नक्सलियों से मोर्चा ले रहे जवान मच्छरों से पस्त हो रहे है। पिछले तीन माह में मलेरिया पीड़ित होकर मेकॉज में 200 से अधिक जवान पहुंच चुके हैं। इनमें एक की मेकॉज में और तीन लोगों की रायपुर-भिलाई में उपचार के दौरान मौत हो चुकी है। जवानों को मलेरिया से बचाने सीआरपीएफ सहित स्वास्थ्य विभाग दवा मुहैया कराता है लेकिन जब तब वे कैंप या हॉस्पिटल पहुंचते हैं, स्थिति गंभीर हो चुकी होती है।
दक्षिण-पश्चिम बस्तर में तैनात अर्द्घसैनिक बल सहित जिला बल के जवान लगातार मच्छरों की मार झेल रहे है। शनिवार को भी झीरमघाटी में तैनात दो जवानों को मलेरिया पॉजीटिव के साथ मेकॉज में भर्ती कराया गया। इससे पहले अक्टूबर से मलेरिया पीड़ित जवानों का मेकॉज पहुंचना जारी है। इनमें से कुछ का उपचार यहीं होता है तो कुछ को रायपुर रिफर कर दिया जाता है। एक जानकारी के अनुसार पिछले तीन माह में 200 से अधिक जवान मलेरिया ग्रसित होकर हॉस्पिटल पहुंचे हैं। एक जानकारी के अनुसार नवंबर माह ही 100 से अधिक जवानों को मेकॉज में भर्ती कराया गया था। मेकॉज में जगह नहीं होने से कुछ जवानों को निजी हॉस्पिटल में दाखिल कराया। इसी दौरान नक्सल आपरेशन के अधिकारी सुरजीत सिंह अत्री और एएसपी विजय पांडेय को भी उपचार के लिए हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था।
नहीं मिलती स्वास्थ्य सेवा
नाम न छापने की शर्त पर कुछ जवानों ने बताया कि उन्हें कैंप और गश्ती के दौरान पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलती हैं। कैंप में नर्स-कमाउंडर तो होते हैं लेकिन विशेषज्ञों के अभाव में सामान्य दवा ही मिलती है। इसके बाद हॉस्पिटल पहुंचने तक काफी दिन लग जाते हैं। प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में जांच के बाद जिला हॉस्पिटल या जगदलपुर भेजा जाता है तब तक बीमारी और बढ़ जाती है। समय पर उपचार नहीं मिलने से कई जवानों की अब तक मौत हो चुकी है।
दी जा रही दवा-प्रशिक्षण
मलेरिया से बचाव के लिए पुलिस और स्वास्थ्य विभाग जवानों को दवा मुहैया कराती है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा क्लोरोक्वीन, प्रीमाक्वीन, एसीटी काम्बी बिल्सिटर के साथ आरडी किट दिया जाता है। जबकि सीआरपीएफ द्वारा मेफ्लोक्वीन दिया जाता है। जिसे स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टर उपयुक्त नहीं मानते। जिला मलेरिया अधिकारी डॉ. संजय बसाक के मुताबिक मेफोक्वीन का बार-बार उपयोग करने से शरीर का प्रतिरोधक क्षमता घट जाता है और बाद में दवा का असर कम होने लगता है। इसकी जगह क्लोरोक्वीन और एसीटी काम्बी बिल्सिटर बेहतर है। मलेरिया जांच के लिए सबसे अच्छा रेपिड डायग्नोकिट बेहतर साबित होता है। सीआरपीएफ के डॉक्टरों से कहा गया है कि जब जवानों को बुखार हो तो मलेरिया के साथ अन्य बीमारियों की भी जांच करें। कई बार मलेरिया के साथ अन्य बीमारियों के चलते दवाओं का असर समय पर नहीं होता। मलेरिया से बचाव के लिए स्वास्थ्य विभाग अधिकारियों ने सीआरपीएफ के डॉक्टर व स्टॉफ को मलेरिया, लक्षण और दवा आदि के संबंध में प्रशिक्षण के माध्यम से जानकारी दी है।
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