
जगदलपुर। आजादी के सात दशक बाद भी बस्तर संभाग के चार सौ से अधिक बसाहट क्षेत्रों में एक भी हैंडपंप स्थापित नहीं किया जा सका है। इन बसाहट क्षेत्रों में लोग झिरिया, नदी-नालों का दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। ऐसे बसाहट क्षेत्रों की संख्या सबसे ज्यादा वनांचल के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में हैं।
पहले न्यूनतम ढ़ाई सौ की आबादी पर एक हैंडपंप स्थापित करने का लक्ष्य तय किया गया था पर केन्द्र सरकार द्वारा पेयजल सुविधा बढ़ाने से जुड़ी एनआरडीडब्ल्यूपी योजना लागू होने के बाद 50 की आबादी वाले बसाहट क्षेत्रों में भी हैंडपंप स्थापित किया जाना है। इसके बावजूद अभी भी संभाग के कई बसाहट क्षेत्रों में हैंडपंपों की स्थापना नहीं हो पाई है हालांकि पीएचई विभाग इन दावों से पूरी तरह सहमत नहीं है। विभाग का दावा है कि कुछ बसाहट क्षेत्र ही छूटे हैं। विभागीय अधिकारी यह भी कहते हैं कि बस्तर में हर साल 40 से 50 नए बसाहट क्षेत्र विकसित हो जाते हैं। दूसरी तरफ ग्राम पंचायतों से पेयजल की उपलब्धता संबंधी पिछले दिनों किए गए सर्वे से निकलकर सामने आए आंकड़े विभाग की पोल खोलते हैं। विदित हो कि बस्तर संभाग के अन्दरूनी इलाकों में हर साल स्वच्छ पेयजल के आभाव में सैकड़ों ग्रामीणों की अकाल मौंत हो जाती है। इसके बावजूद भी गंभीरता से हैंडपंप लगाने की पहल का नहीं होना दुर्भाग्यजनक ही कहा जाएगा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बस्तर संभाग के सात जिलों के 3793 गांवो के 23 हजार 883 बसाहट क्षेत्रों में 45 हजार 543 हैंडपंप, 211 नलजल प्रदाय योजनाएं और 172 स्पॉट सोर्स योजनाएं स्थापित हैं। विभाग के आंकड़ों पर यकीन करें तो भी एक बसाहट क्षेत्र में औसतन दो हैंडपंप का आंकड़ा भी नहीं आता। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अभी भी बस्तर संभाग के कई क्षेत्रों में पीने के पानी के लिए वनवासियों का जद्दोजहद जारी है।