
जगदलपुर। सुप्रीम कोर्ट में पोलावरम के विरोध में दायर याचिका में छत्तीसगढ़ शासन संशोधन करेगी। इसके लिए संशोधन प्रारूप का राज्य शासन ने अनुमोदन भी कर दिया है। दक्षिण बस्तर के सुकमा जिले के एक बड़े भू-भाग को पोलावरम बांध के डूबान से बचाने की मांग को लेकर छत्तीसगढ़ शासन ने आंध्रप्रदेश सरकार तथा भारत सरकार के संबंधित मंत्रालयों को प्रतिवादी बनाते हुए 20 अगस्त 2011 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किया था। जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के अनुसार आंध्रप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के परिप्रेक्ष्य में पोलावरम परियोजना को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय परियोजना घोषित किए जाने तथा आंध्रप्रदेश राज्य का तेलंगाना एवं सीमांध्र में विभाजन के फलस्वरूप बदली हुई परिस्थितियों में इसमें संशोधन जरूरी हो गया है। संशोधन की तैयारी राज्य सरकार पिछले कई महीनों से कर रही थी पर इसकी भनक प्रतिवादी पक्षों को न लगे इसलिए पूरी कार्रवाई को गोपनीय रखा जा रहा था। संशोधन प्रारूप तैयार करने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रविन्द्र ीवास्तव के साथ जल संसाधन विभाग के उच्चाधिकारियों की दिल्ली में 19 और 20 मई को महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। इसके बाद पोलावरम प्रोजेक्ट के संबंध में न्यायालीन मामले के लिए सरकार द्वारा नियुक्त स्टैन्डिंग कौंसिल से कुछ ही दिनों के अंतराल में कई दौर की लंबी चर्चा के बाद संशोधन प्रारूप को अंतिम रूप दे दिया गया। राज्य शासन ने भी 28 मई 2014 को प्रारूप को मंजूदी दे दी है। बताया गया कि संशोधन प्रारूप को इसी माह सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया जाएगा। संशोधन में केस को मजबूत बनाने किन नई आपत्तियों को शामिल किया गया है और किन आपत्तियों को सरकार ने निकालने का निर्णय लिया गया है, इस बात का खुलासा नहीं हो पाया है।
गले की फांस बनी परियोजना
केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की अगुवाई में बनी एनडीए की सरकार और सीमांध्र जहां पोलावरम परियोजना निर्माणाधीन हैं वहां एनडीए की सहयोगी टीडीपी की सरकार है। छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार होने से सरकार के सामने पोलावरम का मामला गले की फांस बन गया है। मोदी सरकार महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजना में शामिल पोलावरम परियोजना को नेशनल प्रोजेक्ट घोषित कर पूरा करने का संकल्प जता चुकी है वहीं परियोजना की शुरू से समर्थक रही टीडीपी सरकार ने छत्तीसगढ़ व ओड़िशा की आपत्तियों को दरकिनार कर प्रोजेक्ट पर काम भी तेज कर दिया है। छत्तीसगढ़ शासन ने 20 अगस्त 2011 को जब सुप्रीम कोर्ट में सिविल सूट दायर किया था उस समय केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूूपीए सरकार थी। आंध्रप्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार थी। जानकार कह रहे हैं कि केन्द्र में सत्ता परिवर्तन होने के बाद सरकार के सामने दुविधा पैदा हो गई कि मोदी सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट का किस स्तर पर और किस तरह से विरोध करें, ताकि राज्य के हित भी प्रभावित न हों और विरोध भी हो जाए।
क्या हैं छत्तीसगढ़ सरकार की प्रमुख आपत्तियां?
01- सुप्रीम कोर्ट में दायर सिविल सूट में छत्तीसगढ़ शासन ने दावा किया है कि पोलावरम परियोजना की स्वीकृति में गोदावरी जल विवाद अभिकरण की शर्तो का उल्लंघन हुआ है क्योंकि छत्तीसगढ़ राज्य के कोंटा में अधिकतम डूबान स्तर बैक वाटर प्रभाव सहित 177.44 फीट प्रस्तावित किया गया है जो 7 अगस्त 1978 के अनुबंध में उल्लेखित 150 फीट के स्तर से 28 फीट अधिक है।
02- सुरक्षात्मक तटबंधों के निर्माण से केन्द्रीय जल आयोग द्वारा उल्लेखित छत्तीसगढ़ में शून्य डूबान की शर्त भी पूरी नहीं होती क्योंकि तटबंध निर्माण हेतु छत्तीसगढ़ राज्य की लगभग 1300 एकड़ भूमि की आवश्यकता होगी तथा सबरी नदी के किनारे पर स्थित आबादी प्रभावित होगी।
03- शबरी नदी तट पर सुरक्षात्मक तटबंधों के निर्माण हेतु गोदावरी जल विवाद अभिकरण के अवार्ड में उल्लेखित शर्तो के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य की सहमति नहीं ली गई है।
04- पर्यावरण स्वीकृति दिनांक 25 अक्टूबर 2005 के पूर्व ईआईए नोटिफिकेशन 1994 के अनुसार छत्तीसगढ़ में लोक सुनवाई नहीं की गई है।
05- भारत सरकार जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा दिनांक 17 अप्रैल 2007 को प्रदत्त स्वीकृति के पूर्व अनुसूचित क्षेत्र में पेसा एक्ट 1996 के अनुसार छत्तीसगढ़ के डूबान प्रभावित ग्रामों में ग्राम सभा की सहमति नहीं ली गई है।
06- सुकमा क्षेत्र में दोरला जनजाति के विलुप्त होने का खतरा बढ़ जाएगा। कई प्रमुख खनिज संपदा जलमग्न हो जाएगी। करीब 48 लाख पेड़ों को नुकसान होगा। सैकड़ों हेक्टेयर वन एवं राजस्व भूमि डूब जाएगी।
क्या कहता है गोदावरी जल विवाद अभिकरण?
पोलावरम परियोजना के निर्माण हेतु ओड़िशा, छत्तीसगढ़ एवं आंध्रप्रदेश के मध्य 7 अगस्त 1978 एवं
2 अप्रेल 1980 को गोदावरी जल विवाद अभिकरण द्वारा अवार्ड जुलाई 1980 के अंतर्गत अनुबंध हुआ था।
01- अनुबंध के अनुसार पोलावरम बांध के निर्माण से छत्तीसगढ़ की तहसील कोंटा जिला सुकमा में डूबान का अधिकतम जल स्तर बैक वाटर प्रभाव सहित 150 फीट रखने पर सहमति हुई थी।
02- 2 अप्रेल 1980 के अनुसार 150 फीट के ऊपर स्थित समस्त भवनों एवं भूमि का मुआवजा भुगतान तथा विस्थापितों का पुनर्वास उसी प्रकार करेगा जैसा कि 150 फीट के नीचे आने वाले डूबान क्षेत्र के लिए किया जाएगा।
03- आंध्रप्रदेश स्वयं के व्यय पर आवश्यक सुरक्षात्मक तटबंधों का निर्माण एवं रखरखाव पर्याप्त पंप व्यवस्था सहित करेगा। उपरोक्त दोनों विकल्पों में से छत्तीसगढ़ राज्य किसी एक एक विकल्प का चयन पोलावरम परियोजना के निर्माण के समय कर सकेगा।
'पोलावरम को नेशनल प्रोजेक्ट घोषित करने और आंध्रप्रदेश के बंटवारे के बाद सुप्रीम कोर्ट में दायर सिविल सूट में संशोधन करने का फैसला लिया गया है।'
-एसव्ही भागवत, मुख्य अभियंता महानदी परियोजना
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