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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 10, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

धुरवा समाज में अग्नि नहीं पानी को साक्षी मान दूल्‍हा-दुल्‍हन लेते हैं सात फेरे, नहीं बरात निकलती

बस्तर की विलक्षण आदिवासी संस्कृति के संवाहक आदिवासी समाज के धुरवा जनजाति के 17 नवयुवक जोड़े सोमवार को दाम्पत्य सूत्र में बंध गए।

By Nai Dunia News NetworkEdited By: Nai Dunia News Network
Publish Date: Tue, 10 May 2022 12:08:14 AM (IST)Updated Date: Tue, 10 May 2022 09:26:46 AM (IST)
धुरवा समाज में अग्नि नहीं पानी को साक्षी मान दूल्‍हा-दुल्‍हन लेते हैं सात फेरे, नहीं बरात निकलती

जगदलपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। बस्तर की विलक्षण आदिवासी संस्कृति के संवाहक आदिवासी समाज के धुरवा जनजाति के 17 नवयुवक जोड़े सोमवार को दाम्पत्य सूत्र में बंध गए। संभागीय धुरवा समाज द्वारा जगदलपुर से 40 किलोमीटर दूर दरभा में सामूहिक विवाहोत्सव का आयोजन किया था। सुबह से शाम तक चले विवाहोत्सव में जोड़ों ने सेमल की डाल और कांगेर व अन्य नदी नालों, जलकुंडों से एकत्र जल को साक्षी मानकर विवाह की रस्में पूरी की। पहली बार वृहद स्तर पर आयोजित सामूहिक विवाहोत्सव में शामिल होने के लिए दूर-दूर से समाज के लोग मेहमान बनकर पहुंचे थे। विवाह में होने वाली फिजूलखर्ची पर रोक लगाने के लिए धुरवा समाज के द्वारा यह आयोजन किया गया था। पिछले साल भी तीन जोड़ों का विवाह सामूहिक विवाहोत्सव में संपन्न हुआ था।

विवाह की तैयारियां कई दिनों से की जा रही थी। समाज के संभागीय महासचिव गंगाराम धुर ने बताया कि समाज में विवाह संपन्न कराने का जिम्मा बाडी मुक्ताक (धुरवी बोली में विवाह कराने वाला प्रमुख) का होता है। विवाह में बरात नहीं निकलती है। विवाह संपन्न कराने के लिए आवश्यक वस्तुओं का बंदोबस्त समाज के द्वारा किया जाता है। रात में ही कांगेर नाला व अन्य जलस्रोतों का जल एकत्र कर विवाहस्थल में लाया गया था। धुरवा समाज में पानी का सबसे अधिक महत्व है। यहां अग्नि नहीं पानी विवाह का साक्षी होता है। सामूहिक विवाहोत्सव में सेमल की डाल और पानी को साक्षी मानकर विवाह की रस्में पूरी की गई।


गीत संगीत की धुन पर मंगलगान विवाहोत्सव में उत्साह का माहौल बना रही थी। विवाह के लिए वर वधू पक्ष को केवल पांच सौ रुपये की राशि पंजीयन शुल्क के रूप में देना पड़ा। बाकी सभी खर्च समाज ने वहन किया। समाज के अध्यक्ष पप्पू नाग ने बताया कि सामूहिक विवाहोत्सव के आयोजन का एक उद्देश्य समाज के युवाओं और भावी पीढ़ी को सामाजिक रीति रिवाज और संस्कृति से परिचय कराना भी था। आगे भी ऐसे आयोजन किए जाते रहेंगे।

धुरवा आदिवासी शबरी नदी के तट पर करते हैं निवास

धुरवा आदिवासियों की आबादी कम है। यह जनजाति यहां बस्तर में पूर्वी क्षेत्र में शबरी नदी के तटीय क्षेत्र में निवास करती है। अपनी संस्कृति, बोली व अन्य विशेषताओं के कारण इस जनजाति का आदिवासी समाज में अलग स्थान है। बस्तर जिले के जगदलपुर, दरभा, बस्तर, सुकमा जिले के छिंदगढ़ विकासखंड में इनकी आबादी अधिक है। विवाहोत्सव में रामसिंह नाइक, बुधराम पुजारी आदि समाज के प्रमुख लोग शामिल हुए।