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जहां माओवादी फहराते थे काला झंडा, वहां 12 से 14 अगस्त तक गुजरेगा तिरंगा, नारायणपुर से कर्रेगुट्टा तक निकाली जाएगी तिरंगा यात्रा

कभी माओवादियों के काले झंडों वाले गढ़ रहे बस्तर में अब तिरंगा यात्रा निकाली जाएगी। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के नेतृत्व में 12 से 14 अगस्त 2026 तक नारा...और पढ़ें

By Paritosh DubeyEdited By: Paritosh Dubey
Publish Date: Mon, 10 Aug 2026 02:47:35 PM (IST)Updated Date: Mon, 10 Aug 2026 02:47:34 PM (IST)
जहां माओवादी फहराते थे काला झंडा, वहां 12 से 14 अगस्त तक गुजरेगा तिरंगा, नारायणपुर से कर्रेगुट्टा तक निकाली जाएगी तिरंगा यात्रा
राजधानी रायपुर में सोमवार को तिरंगा यात्रा के उद् घाटन के अवसर पर इंडोर स्टेडियम में उमड़े नागरिक। - नईदुनिया

नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। जिस बस्तर में कभी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराना भी चुनौती था, अब उसी बस्तर के पुराने माओवादी गढ़ों से तिरंगा यात्रा निकलेगी। माओवादी राष्ट्रीय पर्व पर काले झंडे और बंद के फरमान के जरिए राष्ट्रध्वज का विरोध करते थे।

अब उन्हीं इलाकों में तिरंगा लेकर युवा चलेंगे। 12 से 14 अगस्त तक बस्तर तिरंगा यात्रा-2026 नारायणपुर से शुरू होकर दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर होते हुए कर्रेगुट्टा पहुंचेगी। यात्रा का नेतृत्व उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा करेंगे।

यात्रा के मार्ग का भूगोल हिंसा का गवाह

इस यात्रा की सबसे बड़ी कहानी इसका रास्ता है। यह बस्तर के उस भूगोल से होकर गुजरने वाली यात्रा है, जहां कभी माओवादी हिंसा ने गांवों की पहचान तक बदल दी थी। मिनपा-ताड़मेटला, चिंतागुफा, जगरगुंडा, सिलगेर और टेकलगुड़ेम जैसे नाम देशभर में बड़े माओवादी हमलों और सुरक्षा अभियानों के कारण सुर्खियों में रहे हैं।


नारायणपुर से शुरुआत, कर्रेगुट्टा में समापन

पहले दिन नारायणपुर से धौड़ाई, कन्हारगांव, कोड़ेनार, बोदली, सातधार, बारसूर और गीदम होते हुए दंतेवाड़ा पहुंचेंगे। दूसरे दिन कुआकोंडा, भूसारास घाटी, चिंतागुफा, सुकमा, एर्राबोर, मनीकोटा, दोरनापाल, पोलमपल्ली, कुकानार, मिनपा-ताड़मेटला, चिंतलनार, जगरगुंडा, सिलगेर, टेकलगुड़ेम और आवापल्ली होते हुए बीजापुर पहुंचेगी। तीसरे दिन आवापल्ली, उसूर, गलगम और नंबी होते हुए कर्रेगुट्टा में यात्रा का समापन होगा।

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यात्रा के वे पड़ाव जो याद दिलाते हैं माओवादी हिंसा के घाव

ताड़मेटला-2010 : 6 अप्रैल 2010 को ताड़मेटला क्षेत्र में माओवादियों के हमले में 76 सुरक्षाकर्मी बलिदान हुए थे। यह देश के सबसे घातक माओवादी हमलों में शामिल रहा।

चिंतागुफा : ताड़मेटला हमले का क्षेत्र इसी थाना क्षेत्र से जुड़ा था। दक्षिण बस्तर में लंबे समय तक यह माओवादी प्रभाव और सुरक्षा अभियानों का प्रमुख इलाका रहा।

बुर्कापाल : 2017 में बुर्कापाल में माओवादी हमले में सीआरपीएफ के 25 जवान बलिदान हुए थे।

जगरगुंडा : लंबे समय तक माओवादी प्रभाव वाला दुर्गम क्षेत्र रहा। सड़क और सरकारी पहुंच के विस्तार के साथ यह इलाका सुरक्षा और विकास, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा है।

टेकलगुड़ेम : 2021 में यहां सुरक्षा बलों पर बड़ा माओवादी हमला हुआ था। इसके बाद यह नाम देशभर में चर्चा में रहा।

कर्रेगुट्टा : बीजापुर का यह पहाड़ी इलाका लंबे समय तक माओवादी प्रभाव वाले दुर्गम भूभाग के रूप में जाना जाता रहा। अब यही तिरंगा यात्रा का अंतिम पड़ाव है।

बस्तर ने चुकाई है तिरंगे की कीमत

पिछले वर्ष बिनागुंडा की घटना ने दिखाया था तिरंगे की कीमत का वह दौर। अगस्त 2025 में कांकेर जिले के बिनागुंडा गांव के मनीष नुरेटी का मामला सामने आया। 15 अगस्त को उन्होंने ग्रामीणों और बच्चों के साथ तिरंगा फहराया। इंटरनेट मीडिया पर सामने आए वीडियो में बच्चे राष्ट्रगान गाते और ग्रामीण भारत माता की जय के नारे लगाते दिखाई दिए। इसके बाद माओवादियों ने उन्हें पकड़कर जन अदालत में हत्या कर दी। पुलिस के अनुसार, माओवादियों ने उन पर पुलिस मुखबिर होने का आरोप लगाया था। यह घटना बताती है कि तिरंगा माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में लंबे समय तक समानांतर सत्ता को चुनौती देने का प्रतीक भी था। आज उसी भूगोल में तिरंगा यात्रा का निकलना बस्तर में आए बदलाव का बड़ा सार्वजनिक संदेश है।