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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 05, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

World Environment Day 2025: बस्तर से माओवाद की तरह प्लास्टिक कचरा हटाने का संकल्प, पर्यावरण संरक्षण के साथ महिला सशक्तिकरण

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में स्थापित प्लास्टिक मटेरियल रिकवरी फेसलिटी सह मटेरियल रीसाइक्लिंग सेंटर पर्यावरण संरक्षण और प्लास्टिक कचरा निष्पादन का एक ब...और पढ़ें

By Vinod SinghEdited By: Roman Tiwari
Publish Date: Thu, 05 Jun 2025 10:19:28 AM (IST)Updated Date: Thu, 05 Jun 2025 11:05:01 AM (IST)
World Environment Day 2025: बस्तर से माओवाद की तरह प्लास्टिक कचरा हटाने का संकल्प, पर्यावरण संरक्षण के साथ महिला सशक्तिकरण
प्लास्टिक कचरे का निष्पादन

HighLights

  1. बस्तर में प्लास्टिक कचरा संग्रहण और रीसाइक्लिंग
  2. पर्यावरण के साथ महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा
  3. महानगरों में जा रहा प्लास्टिक लंप्स और ग्रैन्यूल्स

विनोद सिंह, नईदुनिया ,जगदलपुर। माओवादियों की तरह बस्तर से प्लास्टिक कचरे के भी सफाये का संकल्प लिया गया है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर यहां बस्तर का प्लास्टिक मटेरियल रिकवरी फेसलिटी (एमआरएफ) सह मटेरियल रीसाइक्लिंग सेंटर (एमआरसी) एक शानदार उदाहरण पेश कर रहा है कि कैसे कचरे को भी सोना बनाया जा सकता है।

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बता दें कि स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के तहत तीन साल पहले जगदलपुर शहर से 6 किलोमीटर दूर बुरुंदवाड़ा सेमरा में जिला प्रशासन, एचडीएफसी बैंक और सेंटर फार इन्वायरमेंट एजुकेशन (सीइसी) द्वारा स्थापित यह संयंत्र देश का दूसरा और छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा उद्यम है। पहले चरण में यहां केवल प्लास्टिक कचरा संग्रहण की सुविधा थी, तीन माह पूर्व रीसाइक्लिंग का कार्य भी शुरू कर दिया गया है।


पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक विकास

  • यह प्लांट लंप्स और ग्रैन्यूल्स प्लास्टिक के दाने बनाता है और हैदराबाद, मुंबई सहित देश के कुछ बड़े शहरों में भेजा जाता है। जिससे अच्छी खासी कमाई हो रही है।
  • इसकी कचरा संग्रहण क्षमता प्रतिदिन तीन टन और रीसाइक्लिंग क्षमता भी इतनी ही है। अभी प्रतिदिन एक से डेढ़ टन प्लास्टिक दाने तैयार किए जा रहे हैं। भविष्य में उत्पादन बढ़ाने की योजना है।
  • बस्तर के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से प्लास्टिक कचरे का संग्रहण किया जा रहा है।
  • जगदलपुर शहर में 9 एसएलआरएम केंद्र कचरा संग्रहण के लिए बनाए गए हैं, जहां से इस प्लांट को आपूर्ति की जाती है।
  • 50 गांवों से प्लास्टिक कचरा दो से लेकर 16 रुपये प्रति किलो तक में खरीदता है।

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प्रतिष्ठित पुरस्कार जीते

इस प्लांट को प्लास्टिक रीसाइक्लिंग सम्मेलन एशिया 2023 में शहरी और ग्रामीण संगम में एमआरएफ सेटअप और संचालन श्रेणी में प्रथम पुरस्कार मिला था। इसी तरह प्लास्टिक रीसाइक्लिंग सम्मेलन एशिया 2024 में स्थानीय निकाय चैंपियन 2023 श्रेणी में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

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रोजगार की चिंता से मुक्ति कुसुम महिला स्वसहायता समूह

समूह की सदस्य कमला बताती हैं कि प्लांट की स्थापना के कुछ माह बाद उनका समूह यहां काम से जुड़ गया था। समूह की महिलाएं माह में आठ से नौ हजार रुपये या इससे भी अधिक कमा लेती हैं। प्लांट में काम मिलने से रोजगार की चिंता से मुक्त हो गई हैं। वह चाहती हैं कि यहां प्लास्टिक के खिलौने व अन्य सामग्रियां बनाने का कारखाना शुरू हो ताकि रोजगार के अवसरों में और अधिक वृद्धि हो सके।

परिवार की मदद हो जाती है: महिला समूह सदस्य

महिला समूह की सदस्य सेमरा निवासी जगदंबे का कहना है कि प्लांट में स्थायी रोजगार की व्यवस्था होने से जो पैसे मिलते हैं उससे परिवार के जीविकोपार्जन और अन्य खर्चे के लिए हाथ नहीं फैलाना नहीं पड़ता। यहां बड़ी संख्या में महिलाएं काम करती हैं और सभी प्रसन्न हैं और चाहती हैं कि और भी प्लांट की उत्पादन क्षमता का विस्तार होना चाहिए। बताया गया कि कचरा संग्रहण में जिले भर में एक हजार से अधिक महिलाएं जुड़कर काम कर रही हैं।

महिलाएं सशक्तीकरण का बेहतरीन मॉडल

इस प्लांट का संचालन सृष्टि वेस्ट मैनेजमेंट सर्विसेज के साथ राष्ट्रीय आजीविका मिशन से जुड़ी महिला समूह कर रहा है। जो महिला सशक्तीकरण का एक बेहतरीन माडल है। भविष्य में यहां प्लास्टिक के खिलौने और अन्य उत्पाद बनाने की भी योजना है। राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत यह एमआरएफ-एमआरसी प्लांट न केवल पर्यावरण को सुधार रहा है बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर रहा है।

प्लास्टिक संग्रहण के लिए दिए गए ई-रिक्शा

स्वच्छ भारत मिशन के जिला समन्वयक दिलीप गोस्वामी से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र में प्लास्टिक कचरा संग्रहण के लिए 83 ई-रिक्शा का वितरण किया गया है। प्लास्टिक कचरा संग्रहण व आपूर्ति के लिए दंतेवाड़ा और सुकमा जिला प्रशासन के साथ अनुबंध किया गया है। संभाग के अन्य जिलों के साथ भी चर्चा चल रही है।

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छांव की कमी महसूस हुई तो लगाया पौधा, आज दे रहा गर्मी से राहत

कोंडागांव : एक जागरूक ग्रामीण ने अपने व्यवसाय स्थल पर तपती गर्मी से बेहाल होकर पेड़ लगाने की ठानी। चार वर्ष में वह पौधा अब बड़ा हो गया है और गर्मी से राहत दे रहा है। पवन कुमार तिवारी काम की तलाश में वर्ष 2003 में कोंडागांव आए और तहसील कार्यालय के ठीक बगल में चाय की ठेला लगाने लगे। जहां पर चाय ठेला लगाता था। पास में ही एक आम का विशाल पेड़ था। बुजुर्ग पेड़ करोना काल में गिर गया। पेड़ गिरने से ठेले के आसपास गर्मी के समय छांव में खड़े होने की जगह नहीं बची।

पेड़ गिरने का उन्हें मन ही मन अफसोस होने लगा। छांव की कमी महसूस हुई तो उन्होंने चार साल पहले जुलाई के महीने में वन विभाग से बादाम के पौधे लाकर ठेले के पास सड़क किनारे लगाया और नियमित देखभाल करने लगे । उसके बाद पौधा सुरक्षित रूप से बढ़ने लगा। आज चार साल बाद पौधा पेड़ का रूप ले लिया है। अब पेड़ गर्मी के समय में राहत दे रहा है।