नईदुनिया न्यूज, जांजगीर: किसानों की भूमि और फसल के डिजिटल सर्वेक्षण के लिए इस्तेमाल किए जा रहे पीवी ऐप में गंभीर तकनीकी और प्रक्रियागत गड़बड़ियों का मामला सामने आया है। आनलाइन पोर्टल पर दर्ज कुछ भूमि नक्शों में ऐसी विसंगतियां सामने आने का दावा किया जा रहा है कि जांजगीर के खसरा नंबर 334-4 का पालीगान नक्शा छत्तीसगढ़ से निकलकर अटलांटिक महासागर तक पहुंच गया।
वहीं, कुछ किसानों के खेत नक्शे में वास्तविक आकार के बजाय बिंदु या सीधी लकीर के रूप में दिखाई देने की शिकायत है। कृषि भूमि को आवासीय श्रेणी में दर्ज किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। इन गड़बड़ियों के बीच पोर्टल से पालीगान मैप का विकल्प हटाए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, नक्शे में विसंगतियों के कारण और पोर्टल पर बदलाव की वजह की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।
विभाग का दावा है कि मोबाइल में अपलोड करते समय तकनीकी त्रुटी हुई होगी। डिजिटल सर्वे के दौरान दर्ज किए गए भूमि नक्शों में कथित गड़बड़ियां सर्वे प्रक्रिया की गुणवत्ता और निगरानी पर सवाल खड़े कर रही हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कुछ पालीगान नक्शों में खेत की स्थिति और वास्तविक भौगोलिक स्थान के बीच बड़ा अंतर दिखाई देने का दावा है।
कुछ मामलों में नक्शा निर्धारित क्षेत्र से दूर दूसरे भौगोलिक हिस्सों तक पहुंचा हुआ नजर आया। वहीं, कुछ खेतों का आकार बिंदु या सीधी लकीर में सिमटने की शिकायत है। यदि ये विसंगतियां रिकॉर्ड में दर्ज हैं, तो इनके कारणों की तकनीकी जांच कराना जरूरी है।
कृषि भूमि आवासीय दर्ज होने की शिकायत
सर्वे में केवल नक्शे की स्थिति ही नहीं, बल्कि भूमि की श्रेणी को लेकर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि कुछ खेती योग्य जमीन को पीवी ऐप में आवासीय श्रेणी में दर्ज कर दिया गया। रिकॉर्ड में ऐसी त्रुटियां बनी रहने पर भविष्य में गिरदावरी, धान खरीदी पंजीयन, फसल बीमा और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के दौरान किसानों को परेशानी हो सकती है। हालांकि, इन मामलों में संबंधित भूमि अभिलेखों और वास्तविक स्थिति का मिलान किए बिना त्रुटियों की व्यापकता का आकलन करना संभव नहीं है।
गड़बड़ी सामने आने के बाद मैप का विकल्प हटने पर सवाल
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू ऑनलाइन पोर्टल पर पालीगान मैप की उपलब्धता से जुड़ा है। दावा किया जा रहा है कि पहले पोर्टल पर नक्शे दिखाई देते थे, लेकिन गड़बड़ियों की जानकारी सामने आने के बाद मैप देखने का विकल्प उपलब्ध नहीं रहा। ऐसे में सवाल है कि क्या पोर्टल में तकनीकी बदलाव किया गया, क्या त्रुटियों को सुधारने की प्रक्रिया चल रही है या इसके पीछे कोई अन्य वजह है? विभाग को इस संबंध में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। साथ ही, पुराने रिकार्ड और उपलब्ध स्क्रीनशाट के आधार पर गड़बड़ियों की जांच कराई जानी चाहिए, ताकि किसानों की शिकायतों का समाधान हो सके।
दस रुपये प्रति सर्वे और लक्ष्य का दबाव
सर्वे कार्य में लगे कर्मचारियों पर निर्धारित लक्ष्य पूरा करने का दबाव बनाए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि सर्वेयरों को प्रति सर्वे दस रुपये मिलने की बात कही गई थी। इसके साथ ही प्रतिदिन लक्ष्य पूरा करने का दबाव होने से काम की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, भुगतान की शर्तों, प्रशिक्षण, कार्यप्रणाली और अधिकारियों के कथित दबाव से जुड़े इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि सर्वेयरों को पर्याप्त तकनीकी प्रशिक्षण और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए गए थे या नहीं।
निगरानी व्यवस्था पर जवाबदेही तय करने की जरूरत
यदि डिजिटल सर्वे में इस स्तर की विसंगतियां दर्ज हुई हैं, तो यह केवल सर्वेयरों की व्यक्तिगत त्रुटि का मामला नहीं रह जाता। डेटा अपलोड करने, उसका सत्यापन करने और काम की निगरानी करने वाली व्यवस्था की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। यह स्पष्ट होना जरूरी है कि गलत नक्शे और भूमि श्रेणी से जुड़े रिकॉर्ड किस स्तर पर तैयार हुए, उनका सत्यापन किसने किया और त्रुटियां सामने आने के बाद सुधार के लिए क्या कदम उठाए गए।
पीवी ऐप से जुड़े सर्वे की उच्चस्तरीय जांच की मांग किसानों की मांग है कि पीवी ऐप से जुड़े सर्वे की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, त्रुटिपूर्ण भूमि रिकार्ड तत्काल सुधारे जाएं और लापरवाही प्रमाणित होने पर जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए।
डिजिटल सर्वे का उद्देश्य भूमि संबंधी रिकॉर्ड को अधिक सटीक और पारदर्शी बनाना है। ऐसे में तकनीकी गड़बड़ियों के कारण किसानों को भविष्य में किसी प्रकार की परेशानी न हो, इसके लिए विभाग को शिकायतों का परीक्षण कर सुधार की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
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