
0.जिले का इतिहास बयां कर रहे डोम राजा के महल का अवशेष
(नईदुनिया एक्सक्लूजिव)
पᆬोटोक्रमांक 28जेएसपी 2, 3, 4, 5 रियासतकालीन डोम राजा के महल का खंडहर, जेएसपी 6, 7 डोम राजवंश के समय का जोड़ा नगाड़ा, जिसकी आज भी पूजा होती है।
जशपुरनगर। नईदुनिया प्रतिनिधि। जशपुर जिले में सत्ता और वर्चस्व के लिए संघर्ष की कहानी 15 वीं शताब्दी से ही देखने को मिलती है। सत्ता और राजनीति का समय के साथ बदलता गया। लेकिन आज ऐतिहासिक महत्व के खंडहर भी संरक्षित नहीं हैं। 15 वीं सदी के आसपास जशपुर रियासत में डोम वंश का राज्य था। जिले के नारायणपुर थाना क्षेत्र में आज भी डोम राजा के महल का अवशेष देखने को मिल रहा है। संरक्षण के अभाव में महल खंडहर में तब्दील हो चुका है। लेकिन इतिहास बयां कर रहे इन अवशेषों की अनदेखी से महत्वपूर्ण तथ्य भी खंडहर के मलवे में दबते जा रहे हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से डोम वंश के राजमहल का अवशेष महत्वपूर्ण है, जिसके संरक्षण से इतिहास का बेहतर अध्ययन हो सकता है और ऐतिहासिक महत्व के इस स्थल को संरक्षित किए जाने की अपेक्षा जिले के एक बहुत बड़े वर्ग को भी है।
लोक कथाओं और जनश्रुतियों के मुताबिक डोम वंश के अनेक प्रजापालक एवं प्रतापी राजा लोकप्रिय रहे हैं। जिले के इस इतिहास में कई गौरवशाली तथ्य भी हैं और कई बातें आस्था से जुड़ी हैं, जिसे क्षेत्र के निवासी आज भी सम्मान देते हैं। जिस स्थान पर डोम राजा के महल का खंडहर है, उस स्थल का नाम देवटोंगरी है। यह अभ्यारण्य क्षेत्र में है, लेकिन थोड़ी दूरी पर पोखरा टोली, डोम बस्ती भी है, जहां के लोग अपने पूर्वजों को डोम राजा के रूप में याद करते हैं। इस स्थल में कलाकृतियों से परिपूर्ण महल के अवशेष आज भी हैं, जिसका संरक्षण नहीं होने के कारण क्षेत्र से मलवे भी गायब हो रहे हैं। क्षेत्र के निवासी सामाजिक कार्यकर्ता नवरतन बंग ने बताया कि पांच साल पहले इस पुराने महल की स्थिति और अच्छी थी। लेकिन पांच साल पहले हाथियों ने इसे बहुत क्षति पहुंचाई और तोड़ दिया। संरक्षण के अभाव में इसका अस्तित्व खत्म होता जा रहा है। कुछ लोग यहां के ऐतिहासिक पत्थर, शिलालेख, पत्थरों में की गई कलाकृतियों को भी ले गए। डोम वंश के समर्थक वशंज इस क्षेत्र में अपने देवता का वाश मानते हुए सम्मान देते हैं। लेकिन शासन, प्रशासन की उपेक्षा के कारण यहां का इतिहास गुम हो जा रहा है।
जशपुर रियासत के कुछ अनछुए प्रसंग
जशपुर को जगदीशपुर तो कभी यशपुर का नाम यहां की विशेषताओं के आधार पर दिया गया, लेकिन प्रमाणिक दस्तावेजों में आज भी जशपुर जिले को जशपुर ही लिखा जाता है। विशेष रूप से जब नगरपालिका क्षेत्र जशपुर की बात होती है तो इसे जशपुरनगर के रूप में लिखा जाता है। डोम वंश का राजमहल नारायणपुर, कुनकुरी जनपद क्षेत्र में था। आज भी डोमवंश के अवशेष खंडहर में तब्दील महल, विजय डंका, क्षेत्र के ग्रामों के नाम सहित अन्य रूपों में मौजूद है। बताया जाता है कि डोम वंश के अंतिम शासक राजा रायभान ठीक अपने पूर्वजों के विपरीत रियासत के संचालन में गंभीर नहीं थे, जिसके कारण प्रशासनिक व्यवस्था बिगड़ गई और यही कारण डोम वंश के पतन का रहा होगा। यह भी कहा जाता है कि राजा रायभान से प्रजा नाराज थी और रियासत के लोग एक नये नेतृत्व की कल्पना संजोने लगे थे और यही समय परिवर्तन की नींव स्वमेव निर्मित करता गया। इसी दौरान सोनपुर राज्य के राजकुमार सुजान राय अपने कुछ साथियों के साथ टांगीनाथ महादेव बरवेगढ़, झारखंड का दर्शन करते हुए खुड़िया रानी के दर्शन के लिए जशपुर पहुंचे। यात्रा के दौरान सुजान राय की मुलाकात खुड़िया जमींदार से हुई, जिन्होंने सुजान राय को अपने यहां अतिथि के रूप में रहने का निमंत्रण दिया। खुड़िया जमींदार ने सुजान राय को क्षेत्र का भ्रमण भी कराया। भ्रमण के दौरान ही सुजान राय की मुलाकात ग्राम इराई, कुर्रोंग में छेरू राय से हुई। छेरू राय कई गांवों के प्रतिनिधि थे और उनका क्षेत्र में अच्छा वर्चस्व था। खुड़िया जमींदार और छेरू राय जनता और सुजान राय के बीच संवाद का माध्यम बने। क्षेत्र की जनता सुजान राय के व्यवहार से प्रभावित हुई और लोगों ने सुजान राय को राजा के रूप में स्वीकार करते हुए राज्य संभालने निवेदन किया। इस निवेदन के जवाब में सुजान राय ने एक वर्ष का समय मांगा और उन्होंने छेरू राय को जशपुर के जवानों की सेना बनाने और युद्ध कला की शिक्षा के लिए कहा।
डोमवंश को मिटाने ऐसे तैयार हुई सेना
ऐतिहासिक जानकारी सुकर साय, रामप्रकाश पांडे ने बताया कि जब सुजान राय ने राज संभालने की हामी भर दी तो उन्होंने छेरू राय को पᆬौज तैयार करने को कहा। छेरू राय ने देखते ही देखते सैकड़ों गांवों के युवाओं को जोड़कर हजारों की संख्या में फौज तैयार कर ली, जिसका प्रारंभ ग्रामा आरा में एक अखाड़े से किया गया। इसके अस्तित्व का प्रमाण एक पत्थर आज भी पुलिस चौकी परिसर में स्थित है। इस पत्थर के प्रति लोगों की अटूट आस्था है। सेना तैयार करने में दो योद्धाओं 'उड़ान' और 'पड़ान' का नाम काफी चर्चित है, जिनकी कहानी लोगों की जुबानी है। डोम वंश के राजा रायभान को इसकी भनक भी नहीं लगी और राजकुमार सुजान राय ने छेरू राय को अपनी सेना का मुख्य सेना नायक बनाकर डोम राजा के विरूद्ध युद्ध का शंखनाद कर दिया। यह युद्ध ग्राम रनपुर में हुआ। बताया जाता है कि युद्ध स्थल का नाम यहां हुए युद्ध(रण) के कारण ही रनपुर पड़ा जो आज भी प्रचलित है। किवदंतियों के मुताबिक जब राजा रायभान युद्ध के मैदान में सामने आए तो उसके पास गिनती के ही सैनिक रह गए थे और कुछ समय के युद्ध में ही राजा रायभान ने हार स्वीकार करते हुए स्वयं ही आत्महत्या कर ली। यहीं से डोमवंश का पतन हो गया और जशपुर रियासत के अंतिम रियासत की नई पीढ़ी का प्रारंभ राजा सुजान राय के रूप में हुआ। विजय प्राप्त करने वाले राजकुमार सुजान राय का धूमधाम से खुड़िया जमींदार एवं छेरू राय के नेतृत्व में जशपुर की जनता के द्वारा राज्याभिषेक किया गया। राजा सुजान राय के साथ ही जशपुर रियासत की एक नई नींव रखी गई। जशपुर रियासत के प्रथम राजा सुजान राय से लेकर अंतिम राजा विजय भूषण सिंहदेव तक सभी राजाओं के कृतित्व की छाप आज भी जशपुर जिले में देखने को मिलती है।
रियासत में पांच जमींदारों का उल्लेख
रियासत में पांच जमींदारों का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें आरा जमींदारी और खुड़िया जमींदारी से जुड़े दस्तावेज व जानकारियां अन्य जानकारियों की अपेक्षा सहजता से उपलब्ध हैं। साथ ही केराडीह, बंदरचुंआ और फरसाबहार जमींदारी से जुड़ी जानकारियां भी संग्रहित की जा सकती हैं। जशपुर जिले में रियासतकालीन परंपराओं और वनवासी संस्कृति का अनूठा संगम इस बात का प्रमाण है कि आज भी जशपुर जिले की आधे से अधिक जनता अपने पर्व, त्योहार और विविध आयोजनों को रियासतकालीन परंपराओं से अलग कर अधूरा महसूस करती है।
दैवीय शक्ति से परिपूर्ण थे डोम राजा
डोम राजा के संदर्भ में यह बात कही जाती है कि उन्हें दिव्य शक्ति प्राप्त थी और वे जो कह या लिख देते थे, वह पूरा हो जाता था। सुजान राय ने जब डोम राजा के विरूद्ध हमला किया और वे हार गए, तब उन्होंने पत्थर पर लिखा कि इस रियासत की गद्दी पर जो भी बैठेगा, वह जीवित नहीं रहेगा। बताया जाता है कि इस समय वहां पर खुड़िया दीवान मौजूद थे और उन्होंने ही राजा सुजान राय को यह जानकारी दी। इस बात को समझते हुए राजा सुजान राय ने रियासत की गद्दी पर कालांतर में भगवान बालाजी को स्थापित किया। रियासत का संचालन तो राजा किया करते थे, लेकिन गद्दी पर भगवान बालाजी को ही पूजा जाने लगा और यह परंपरा आज भी है। हर एक अवसर पर जशपुर में सबसे पहले भगवान बालाजी की पूजा, आराधना की जाती है।
राजपरिवार का वंश वृक्ष
राज्य संस्थापक सुजान राय, राजा छोटा राय, राजा रैया राय, राजा मकसूदन राय, राजा तेज राय, राजा माधो सिंह, राजा अनूप सिंह, राजा अमर सिंह, राजा नरसिंह देव, राजा रणसिंह देव, राजा शिरीष सिंह, राजा गजेंद्र सिंहदेव, राजा अनिरूद्ध सिंहदेव, राजा नागेंद्र सिंहदेव, राजा तिलविक्रम सिंहदेव, राजा भीमकरण सिंहदेव, राजा सुरेंद्र सिंहदेव, राजा डुमराज सिंहदेव, राजा रणजीत सिंहदेव, राजा राम सिंहदेव, राजा प्रताप नरायण सिंहदेव, राजा विष्णु प्रसाद सिंहदेव, राजा देवशरण सिंहदेव, राजा विजय भूषण सिंहदेव।
अंतिम राजा विजय भूषण सिंहदेव
राजा विजय भूषण सिंह देव रियासत के अंतिम राजा थे। राजा विजय भूषण सिंह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी राजनीति में सक्रिय रहे और सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका से उन्हें लोकप्रियता मिली। राजा विजय भूषण सिंह देव के दो पुत्र युवराज उपेंद्र सिंहदेव और कुमार दिलीप सिंह जूदेव हुए। युवराज उपेंद्र सिंहदेव के दो पुत्र राजा रणविजय सिंहदेव और कुमार विक्रमादित्य सिंहदेव हुए, वहीं कुमार दिलीप सिंह जूदेव के तीन पुत्र क्रमशः शत्रुंजय प्रताप सिंह जूदेव, प्रबल प्रताप सिंह जूदेव और युद्धवीर सिंह जूदेव हुए। राजतंत्र नहीं रहा परंतु परंपरानुसार वरिष्ठता क्रम में रणविजय सिंह देव को उत्तराधिकारी के रूप में जिलेवासी आज भी सम्मान के साथ राजा कहकर संबोधित करते हैं। सक्रिय राजनीति में आने के बाद रणविजय सिंह अपने नाम के साथ जूदेव लिखने लगे। वे वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं। वहीं कुमार दिलीप सिंह जूदेव व उनके बेटे शत्रुंजय प्रताप सिंह जूदेव के देहावसान के बाद उनके कार्यों को आगे बढ़ाते हुए प्रबल प्रताप सिंह जूदेव वर्तमान में जिला पंचायत उपाध्यक्ष हैं। युद्धवीर सिंह जूदेव भी राजनीति में सक्रिय हैं,वे चंद्रपुर से लगातार दो बार विधायक निर्वाचित हुए हैं। जूदेव परिवार की बहू और स्व. शत्रुंजय प्रताप सिंह की पत्नी श्रीमती प्रियंवदा सिंह जूदेव वर्तमान में नगरपालिका उपाध्यक्ष हैं। साथ श्री वे राजनीति के साथ ही सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय हैं।
'' प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी ने बनारस में वहां के डोम राजा जगदीश चौधरी को अपना प्रस्तावक बनाया। जिसके बाद जशपुर जिले में रहने वाले डोम राजवंश के लोगों में उत्साह बढ़ा है। अपने ऐतिहासिक, पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण को लेकर वे अब गंभीर हैं। क्षेत्र के डोम वंशज यह मानते हैं कि उनका संबंध डोम राजा काशी के साथ रहा है। इसके लिए प्रतिनिधि मंडल इतिहास को खंगालने प्रयासरत है, जिसमें शासन, प्रशासन को पहल करनी चाहिए।
रामप्रकाश पांडे
सामाजिक कार्यकर्ता
जशपुरनगर