अंतागढ़। इस वर्ष 15 अगस्त को जहां आजादी का अमृत महोत्सव अर्थात स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी जोर शोरों से पूरे देश में की जा रही है, वही अंतागढ़ ब्लाक मुख्यालय से महज 15 किमी दूर स्थित गांव जो कभी व्यापारिक दृष्टिकोण से महत्त्‌वपूर्ण हुआ करता था, वहां के स्कूली बच्चे आज भी बरसात के दिनों में उफनती नदी पार कर विद्यालय जाने को विवश हैं।

एक समय में ग्राम सरंडी एवं उस क्षेत्र के करीब छह से सात गांव बरसात के मौसम में टापू का रूप ले लेते थे, क्योंकि ग्राम सरंडी को अंतागढ़ ब्लाक मुख्यालय से जोड़ने वाले मार्ग के चिहरीपारा नदी में वर्षों तक पुल नहीं था। किंतु सुरक्षा बलों की उपस्थिति में कुछ वर्ष पूर्व ही विद्यालय के भवन के साथ ही नदी में छोटे पुल को भी कुछ समय पहले बना दिया गया, जिससे क्षेत्र के सभी ग्रामीणों का बारिश के दिनों में अंतागढ़ ब्लाक मुख्यालय आना आसान हो गया।

ग्राम पंचायत सरंडी के सरपंच जोहित राणा ने बताया कि इस विषय में शासन प्रशासन एवं कुछ दिनों पहले ग्राम आमाकड़ा आए मुख्यमंत्री को भी अवगत कराया गया है, किंतु अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। ज्ञात हो, इस स्कूल को भी खुले करीब 73 साल हो गए और यह स्कूल भी दो सालों बाद अपनी 75वी

वर्षगांठ मनाएगा। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या इस विद्यालय के छात्र छात्राओं को विद्यालय के 75वीं वर्षगांठ पर शिक्षा ग्रहण करने के लिए विद्यालय जाने हेतु इस नदी को पार करने के लिए पुल नसीब हो पाएगा अथवा नहीं।

हम बात कर रहे हैं अंतागढ़ ब्लाक के ग्राम सरंडी की, जो किसी समय व्यापारिक दृष्टिकोण से अंतागढ़ ब्लाक का महत्त्‌वपूर्ण ग्राम हुआ करता था, किंतु समय बदला और उत्तर बस्तर में भी नक्सलियों का दखल करीब तीन दशक पहले बढ़ने लगा। ग्राम सरंडी में नक्सलियों का दबाव काफ़ी बढ़ गया, ग्राम सरंडी में उच्च एवं उच्चतर माध्यमिक विद्यालय का संचालन सन 1949 से ही प्रारंभ हो चुका है, किंतु नक्सलियों ने इन पक्के विद्यालय के भवनो को महज इसलिए तोड़ दिया क्योंकि सुरक्षा बलों को इन स्कूलों में रुकने की जगह मिल रही थी, और ऐसे में नक्सली सुरक्षा बलों पर हमला नहीं कर सकते थे। इन स्कूलों के तोड़े जाने के पश्चात प्रशासन द्वारा इन पक्के स्कूली भवनों की जगह पोटाकेबिन का निर्माण कराया गया, जो कि बांस से बना एक पूरा भवन जैसा होता है, नक्सलियों को इन पोटाकेबिन से परेशानी नहीं थी क्योंकि पोटा केबिन में सुरक्षा बल रुक नहीं सकते थे, और यदि सुरक्षा बल इन पोटाकेबिन में रुक भी जाते तो वे नक्सलियों की गोलियों के आसानी से शिकार बन सकते थे, हम ये भी मान सकते हैं की तत्कालीन सरकार ने नक्सलियों की मांग मान ली।

एक समय आया जब प्रशासन ने ग्राम सरंडी में 90 के दशक में पुलिस चौकी भी खोलना चाहा और चौकी खोला भी गया किंतु नक्सलियों के दबाव ग्रामीणों पर पड़ने लगे और कुछ ग्रामीणों के विरोध के बाद इस पुलिस चौकी को सरंडी से हटा दिया गया व ग्राम ताड़ोकी में पुलिस चौकी दे दी गई, अब समस्त कार्यों का संचालन थाना ताड़ोकी के अंतर्गत ही होने लगा।

यहां यह बताना भी आवश्यक है कि नक्सली हमेशा से सड़क और पुल - पुलिया निर्माण के सख़्‌त विरोधी रहे हैं, वजह थी इनकी सुरक्षा। क्योंकि, पुल पुलियों व सड़क नक्सलियों की मांद तक पहुंचने के लिए सुरक्षा बलों के लिए काफी मददगार थी, जो कि नक्सली कभी भी नही चाहते थे, वे नही चाहते थे कि उनके इलाके में सुरक्षा बलों की पहुंच आसान हो सके।

Posted By: Nai Dunia News Network

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