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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 15, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

परलकोट का प्रसिद्घ नर-नारायण मेला शुरू

पखांजूर। परलकोट क्षेत्र का प्रसिद्ध नर-नारायण सेवाश्रम मेले का बुधवार को मकर संक्रांति के पावन अवसर पर शुभारंभ हो गया। छह-सात दिनों तक चलने वाले इस मे...और पढ़ें

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Publish Date: Thu, 15 Jan 2015 12:18:10 AM (IST)Updated Date: Thu, 15 Jan 2015 12:18:10 AM (IST)
परलकोट का प्रसिद्घ नर-नारायण मेला शुरू

पखांजूर (निप्र)। परलकोट क्षेत्र का प्रसिद्ध नर-नारायण सेवाश्रम मेले का बुधवार को मकर संक्रांति के पावन अवसर पर शुभारंभ हो गया। छह-सात दिनों तक चलने वाले इस मेले में करीब चार-पांच लाख लोग पहुंचते हैं। ईश्वर का अवतार माने जाने वाले स्वामी सत्यानंद परमहंस के अनुयायियों द्वारा 51 वर्ष पूर्व इस मेले की शुरुआत की गई थी। तब से अब तक प्रत्येक मकर संक्रांति से यह मेला प्रारंभ होता आ रहा है। इसमें देश सहित विदेश से भी श्रद्घालु पहुंचते हैं। यहां करोड़ों का कारोबार होता है।

शुरुआत में यह मेला केवल एक दिन का होता था। समय के साथ इसका भी समय बढ़ने लगा और आज छह-सात दिन का मेला होता है। इसमें हर साल करीब चार-पांच लाख लोग देश के विभिन्न इलाकों से पहुंचते हैं। परलकोट का यह सुप्रसिद्ध मेला न केवल श्रद्घालुओं की आस्था और हुजूम के लिए जाना जाता है बल्कि इस मेले में रिकार्ड कारोबार भी होता है। इस मेले में स्थानीय सहित बड़ी संख्या में देश के कोने-कोने से व्यापारी पहुंचते हैं।


कौन हैं स्वामी सत्यानंद

बांग्लादेश के फरितपुर जिले के दक्षिण खालिया ग्राम में जन्मे स्वामी सत्यानंद की बाल्यकाल से ही ईश्वर के प्रति आस्था था। परिवार और सांसारिक मोह-माया को त्याग उन्होंने बहुत ही कम उम्र में वैराग्य का मार्ग अपना लिया था। बहुत ही तेजस्वी होने के कारण बड़ी तेजी से उनके शिष्यों की संख्या बढ़ने लगी। कम उम्र में ही उन्होंने उपदेश देना शुरू कर दिया था। स्वामीजी का तेज देख क्षेत्र सहित देश के कई स्थानों में अनुयायी उन्हें ईश्वर का अवतार मानकर पूजा करते हैं।

माथानबाड़ी में बनाया प्रथम आश्रम

स्वामी सत्यानंद ने घर-द्वार त्याग अपना प्रथम आश्रम बांग्लादेश के माथानबाड़ी में बनाया था। वहीं अपने शिष्यों के साथ रहकर कई वर्षों तक लोगों की सेवा की। जब भारत बांग्लादेश विभाजन हुआ तब स्वामी सत्यानंद भी अपने कुछ शिष्यों के साथ शरणार्थी बनकर भारत देश के इस परलकोट क्षेत्र में आ गए। लोगों की सेवा में निरंतर तत्पर रहते हुए उन्होंने यहां नरनारायण सेवाश्रम की स्थापना की, जहां आज क्षेत्र का सबसे प्रसिद्ध मेला लगता है।

1974 में स्वामीजी ने ली समाधी

स्वामी सत्यानंद ने अपने संपूर्ण जीवनकाल में भौतिक सुविधाओं को त्याग लोगों की निःस्वार्थ भावना से सेवा की। नरनारायण सेवाश्रम के माध्यम से जन-जन तक अपनी सेवा पहुंचाई। ईश्वरीय ज्ञान ध्यान को जन-जन तक पहुंचाते हुए शिक्षा दीक्षा का अपने शिष्यों में प्रसार किया। स्थानीय लोग उन्हें ईश्वर का अवतार मानते हैं। सन 1974 में स्वामीजी ने इस भू को त्याग समाधी ले ली। उनकी समाधी पर आज क्षेत्र का सबसे भव्य मंदिर स्थापित है। उनके दिव्य देह को उनकी मूर्ति स्वरूप के नीचे एक विशेष कक्ष में रखा गया है।

क्षेत्र का प्रथम निजी हायर सेकंडरी स्कूल बनवाया

बांग्लादेश विभाजन के पश्चात्‌ शरणार्थी बनकर आये क्षेत्र के लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने बच्चों के शिक्षा की थी। इसके चलते स्वामी सत्यानंद जी ने नरनारायण सेवाश्रम और अपने शिष्यों के सहयोग से सभी धर्मो और वगोर् के बच्चों की शिक्षा के लिए क्षेत्र के प्रथम निजी हायर सेकंडरी स्कूल की स्थापना की। 1979 में पंजीकृत यह स्कूल आज सत्यानंद उच्चतर माध्यमिक शाला के नाम से विख्यात है। इस स्कूल से निकले बच्चे आज कई उच्च पदों पर कार्यरत हैं।