दशरंगपुर। असुरों के कुल में पैदा हुआ कोई बालक विष्णु भक्त हो सकता है यह भक्त प्रह्लाद ने सिद्घ कर दिया था। वह मां कयाधु के गर्भ से ही नारायण भगवान का भक्त बन गया था क्योंकि उसकी माँ गर्भावस्था में भगवान श्री नारायण का गुणगान एवं भजन कीर्तन करती थीं, जिसके कारण से भक्त प्रह्लाद गर्भ के समय से भी विष्णुभक्त बन गए थे ।
उक्त बातें दशरंगपुर में अयोजित श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिन व्यास गद्दी पर विराजमान चित्रकूट धाम से पहुंचे पं.आचार्य अशोक बाजपेयी ने कहीं। पं. आचार्य ने कहा कि भक्त प्रह्लाद को उसके हिरण्यकश्यप ने बहुत यातनाएं दी, पर बेटे को विष्णुभक्ति से डिगा न सके। प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप खुद को ही ईश्वर मानता था। वह अपनी पूजा कराने लगा था। ऐसी शक्तियां और सिद्घियां उसने पा ली थी कि कोई भी प्राणी, कहीं भी, किसी भी समय उसे मार नहीं सकता था। किसी भी जीव-जंतु, देवी-देवता, राक्षस या मनुष्य से अवध्य, न रात में न दिन में, न पृथ्वी पर, न आकाश में, न घर, न बाहर। कोई अस्त्र-शस्त्र भी उस पर असर न कर पाए। ऐसा वरदान पाकर वह निरंकुश अत्याचारी बन बैठा। पर प्रह्लाद की विष्णु भक्ति बुरी तरह खलने लगी। प्रह्लाद को मारने के कई प्रयत्न किए गए, लेकिन हर बार वह बच गए। होलिका को अग्नि से बचने का वरदान था। हिरण्यकश्यप ने होलिका की सहायता से प्रह्लाद को जलाकर मारने की योजना बनाई। उसके अनुसार होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती हुई अग्नि में जा बैठी, लेकिन प्रह्लाद चमत्कारी ढंग से बच गए और होलिका जलकर राख हो गई। उधर विष्णु ने नृसिंह के रूप में खंभे से निकलकर गोधूलि के समय हिरण्यकश्यप को मार डाला। मान्यता है कि तभी से होली का त्योहार मनाया जाने लगा।
इसके पूर्व पं. आचार्य ने जड़भरत, धु्रव चरित्र, शिव चरित्र एवं लोभ, काम ,क्रोध एवं मोह के विषय पर कथा कही। उन्होंने कहा कि भगवान विष्णुजी के भजन एवं श्रीमद भागवत कथा सुनने से सभी प्रकार के विकार दूर हो जाते हैं। दशरंगपुर में श्रीमद भागवत ज्ञान यज्ञ महोत्सव का आयोजन विष्णु प्रसाद केशरी परिवार द्वारा किया गया है। कथा श्रवण के लिए भक्तों की भारी भीड़ लग रही है।