नईदुनिया प्रतिनिधि, कोरबा: धान की फसल अब बालियां आने के दौर में पहुंच गई है। खेतों में लहलहा रही धान की फसल की सुगंध हाथियों के झुंड को जंगल से खेतों तक खींच ला रही है। इसके साथ ही वनांचल के गांवों में हाथी-मानव द्वंद्व का खतरा एक बार फिर बढ़ गया है। हाथियों का दल रात ही नहीं बल्कि दिन में भी खेतों में पहुंचकर खड़ी फसल को रौंदने और चरने से किसानों की महीनों की मेहनत बर्बाद कर रहे हैं।
स्थिति यह है कि किसान अपनी जान जोखिम में डालकर रात में खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। वन विभाग के अनुसार कटघोरा वनमंडल में 52 और कोरबा वनमंडल में 13 हाथी विचरण कर रहे हैं। दोनों वनमंडलों में पिछले एक माह के दौरान हाथियों ने करीब 33 एकड़ फसल को नुकसान पहुंचाया है।
कटघोरा वनमंडल के पसान सर्किल में हाथियों का उत्पात लगातार जारी है। तराईनार जंगल में डेरा जमाए करीब 52 हाथियों का दल रात होते ही जंगल से बाहर निकलकर आसपास के गांवों और खेतों की ओर बढ़ रहा है। बीती रात हाथियों ने भर्रापारा, कुम्हारीसानी, बोकरामुड़ी और तराईनार गांव के खेतों में पहुंचकर धान की फसल को नुकसान पहुंचाया। कई खेतों में हाथियों ने खड़ी फसल को रौंदने के साथ ही उसे चर दिया।
ग्रामीणों के अनुसार
हाथियों का दल दिनभर जंगल में रहता है और शाम ढलते ही सक्रिय हो जाता है। कई बार यह दल अलग-अलग झुंडों में बंटकर गांवों की ओर बढ़ता है। रातभर खेतों और गांवों के आसपास विचरण करने के बाद सुबह होने से पहले वापस जंगल लौट जाता है। इस वजह से ग्रामीणों को दिन के साथ-साथ रात में भी सतर्क रहना पड़ रहा है।
महीनों की मेहनत पर एक रात में पानी
धान की फसल इस समय किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण दौर में है। बालियां निकलने के साथ ही फसल तेजी से पकने की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय हाथियों के खेतों में पहुंचने से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों की लगातार आवाजाही के कारण खेतों की निगरानी करना भी मुश्किल हो गया है।
कई किसान समूह बनाकर खेतों के आसपास निगरानी कर रहे हैं, लेकिन हाथियों के बड़े दल के सामने उनकी सुरक्षा भी चिंता का विषय बनी हुई है। प्रभावित किसानों ने फसल नुकसान का शीघ्र आकलन कर मुआवजा देने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों की मौजूदगी के कारण खेती करना लगातार जोखिम भरा होता जा रहा है।
करतला क्षेत्र में भी चार हाथियों का डेरा
कोरबा वनमंडल के करतला परिक्षेत्र में भी हाथियों की मौजूदगी बनी हुई है। यहां चार हाथियों का दल कोटमेर क्षेत्र में दिनभर विचरण करता रहा। रात में हाथियों ने बड़मार गांव की ओर रुख किया और खेतों में पहुंचकर धान की फसल को नुकसान पहुंचाया। पसान में 52 और करतला क्षेत्र में चार हाथियों की मौजूदगी से वनांचल के किसानों की चिंता बढ़ गई है। वन विभाग की टीमें हाथियों की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं और ग्रामीणों को हाथियों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी जा रही है।
पतुरियाडांड के पास हाईवे पर लग रही वाहनों की कतार
हाथियों की लगातार आवाजाही का असर अब यातायात पर भी पड़ रहा है। पतुरियाडांड के पास हाथियों का झुंड एक ही स्थान पर लंबे समय तक मौजूद रहने के कारण राष्ट्रीय राजमार्ग पर भारी वाहनों की कतार लग रही है। विशेषकर देर रात हाथियों के सड़क के आसपास पहुंचने पर वाहनों की आवाजाही प्रभावित होती है। इससे वाहन चालकों को भी खतरा बना रहता है। ग्रामीणों और राहगीरों को कई बार जान जोखिम में डालकर सफर करना पड़ता है। सरकारी फाइलों में सिमटा
एलीफेंट कारिडोर
हाथी-मानव द्वंद्व को कम करने के लिए लेमरू हाथी अभयारण्य और एलीफेंट कारिडोर जैसी योजनाओं की चर्चा लंबे समय से होती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका प्रभाव नजर नहीं आ रहा है। मरवाही, सरगुजा, कोरबा, धरमजयगढ़ और रायगढ़ क्षेत्र में हाथियों की आवाजाही लगातार बनी हुई है। एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में हाथियों को खदेड़ने की स्थिति बन रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि जंगलों में मानवीय दखल बढ़ने और हाथियों को बार-बार खदेड़े जाने से उनके स्वाभाविक विचरण क्षेत्र में बाधा पैदा हो रही है। इससे हाथियों के व्यवहार में आक्रामकता बढ़ने की आशंका बनी रहती है। स्थायी समाधान के लिए सुरक्षित हाथी गलियारे और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण पर प्रभावी ढंग से काम करने की जरूरत है।
जनवरी से अब तक 11 लोगों की मौत
हाथी-मानव द्वंद्व की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जनवरी से अब तक जिले में हाथियों के हमले से 11 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें अधिकांश घटनाएं लोनर हाथियों से जुड़ी बताई जा रही हैं। इसके अलावा हाथियों ने ढाई सौ से अधिक मकानों को नुकसान पहुंचाया है। वन विभाग की निगरानी और ग्रामीणों को लगातार दी जा रही सतर्कता के बावजूद लोगों को भय के माहौल में जीवन बिताना पड़ रहा है।