
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: किसी खदान से आखिरी बार कोयला निकलना उसके सफर का अंत नहीं, यह एक नई जिम्मेदारी की शुरुआत है। इसी सोच को जमीन पर उतारते हुए साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) वैज्ञानिक माइन क्लोजर में देश का नंबर-वन संगठन बनकर उभरा है। कंपनी ने अब तक 28 खदानों का वैज्ञानिक क्लोजर पूरा किया है, जो देश में वैज्ञानिक रूप से बंद परित्यक्त खदानों का 67 प्रतिशत है।
एसईसीएल की उपलब्धि सिर्फ बंद खदानों की संख्या तक सीमित नहीं है। वर्ष 2025-26 में कंपनी ने अकेले 25 खदानों का वैज्ञानिक क्लोजर पूरा किया, जो एक वर्ष में देश के किसी भी संगठन द्वारा हासिल किया गया सर्वाधिक आंकड़ा है। कंपनी के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक हरीश दुहन ने माइन क्लोजर को खनन का अंत नहीं, नए अध्याय की शुरुआत बताया है। उनका जोर भूमि के सुरक्षित पुनर्स्थापन, पर्यावरणीय संतुलन और खनन के बाद समाज के लिए उपयोगी विकल्प तैयार करने पर है।
वैज्ञानिक क्लोजर के तहत भूमिगत खदानों के प्रवेश मार्ग सुरक्षित तरीके से बंद किए जाते हैं, अनुपयोगी ढांचे हटाए जाते हैं और प्रभावित भूमि को स्थिर किया जाता है। इसके बाद स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, खनन इतिहास और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप पुनर्स्थापन की योजना बनाई जाती है। एसईसीएल हर खदान के लिए एक जैसी रणनीति के बजाय स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित माडल अपना रहा है।
पर्यावरणीय बहाली के मोर्चे पर भी काम व्यापक है। कुछ क्षेत्रों में घना हरित आवरण विकसित करने के लिए मियावाकी पद्धति अपनाई गई है। वहीं जल संसाधनों को भी स्थानीय उपयोग से जोड़ा जा रहा है। जमुना कोलियरी, बी-सीम कोलियरी और सुभाष इंक्लाइन में जल शोधन संयंत्र स्थापित किए गए हैं। मीरा भूमिगत खदान का पानी कोतमा नगर पालिका के जल शोधन संयंत्र तक पहुंचाया जा रहा है।
बंद खदानों की जमीन बनी हरित प्रयोगशाला
एसईसीएल के वैज्ञानिक क्लोजर में पर्यावरणीय पुनर्स्थापन को महज पौधरोपण तक सीमित नहीं रखा गया है। प्राकृतिक वनस्पति को संरक्षित रखने, स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार हरित क्षेत्र विकसित करने और मियावाकी पद्धति के इस्तेमाल से अलग-अलग मॉडल अपनाए गए हैं। वर्ष 2025-26 में 13.96 लाख पौधे लगाने के साथ 567 हेक्टेयर पुनःप्राप्त भूमि को हरित आवरण के दायरे में लाया गया। इससे 80,100 टन से अधिक कार्बन डाइआक्साइड में कमी का अनुमान है।
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पानी जो कभी खनन का हिस्सा था, अब जीवनधारा
खनन के बाद उपलब्ध पानी को बेकार छोड़ने के बजाय एसईसीएल ने उसे स्थानीय जरूरतों से जोड़ने की दिशा में काम किया है। जमुना कोलियरी, बी-सीम कोलियरी और सुभाष इंक्लाइन में जल शोधन संयंत्र स्थापित किए गए हैं। मीरा भूमिगत खदान का पानी कोतमा नगर पालिका के जल शोधन संयंत्र तक पहुंच रहा है। जोहिल्ला क्षेत्र में कोल नीर पहल के माध्यम से उपचारित पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है, जबकि पिपरिया भूमिगत खदान में भी ऐसी सुविधा विकसित हो रही है।
जहां कभी कोयला, अब पर्यटकों की आवाजाही
पुनःप्राप्त खदान भूमि को सार्वजनिक उपयोग में बदलने की दिशा में एसईसीएल ने कई स्थानों पर ईको पार्क विकसित किए हैं। सूरजपुर जिले का केनापारा ईको पार्क इसका प्रमुख उदाहरण है। यहां पर्यावरण संरक्षण के साथ मनोरंजन और सामुदायिक भागीदारी को जोड़ा गया है। इस पार्क की प्रशंसा भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं ट्वीट के माध्यम से कर चुके हैं। राजनगर, गेवर्रा, उत्तर झगराखंड, नौरोजाबाद पूर्व और कुसमुंडा में भी ईको पार्क विकसित या शुरू किए गए हैं।
जलाशयों में मछली पालन से खुला कमाई का रास्ता
माइन क्लोजर का सामाजिक पक्ष स्थानीय लोगों के लिए आजीविका के विकल्प तैयार करने से भी जुड़ा है। खनन के बाद बने जलाशयों में पिंजरा आधारित मत्स्य पालन शुरू किया गया है। वर्तमान में 56 मछली पालन पिंजरे संचालित हैं, जिनसे लगभग 25 टन वार्षिक मछली उत्पादन हो रहा है। इस पहल से 206 लोगों के लिए आजीविका के अवसर तैयार हुए हैं। सहभागी परिवारों के लिए लगभग तीन लाख रुपये तक की संभावित वार्षिक आय का अनुमान है। आगे शहद प्रसंस्करण, हल्दी खेती और मुर्गी पालन जैसी गतिविधियों की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं।
कोयले वाली जमीन अब पैदा करेगी स्वच्छ ऊर्जा
माइन क्लोजर के भविष्यवादी प्रयोगों में पुनःप्राप्त भूमि पर सौर ऊर्जा परियोजनाओं का विकास महत्वपूर्ण है। भटगांव और बिश्रामपुर में 20-20 मेगावाट की सौर ऊर्जा परियोजनाएं शुरू हो चुकी हैं। विवेक नगर भूमिगत खदान में पांच मेगावाट, पिनौरा भूमिगत खदान में 40 मेगावाट तथा शारदा खुली खदान में 1.5 मेगावाट की तैरती सौर ऊर्जा परियोजना पर काम चल रहा है। यानी ऊर्जा देने वाली कोयला भूमि अब स्वच्छ ऊर्जा के अगले दौर में भी योगदान देने की तैयारी कर रही है।
समुदाय से जुड़ा क्लोजर माडल
एसईसीएल के माइन क्लोजर माडल में पर्यावरणीय बहाली के साथ सामाजिक जिम्मेदारी को भी केंद्र में रखा गया है। बंद खदान क्षेत्रों के आसपास स्वास्थ्य शिविर, कौशल विकास और स्थानीय समुदायों के साथ संवाद जैसी गतिविधियां संचालित की गई हैं। 34 बंद खदान क्षेत्रों में स्वास्थ्य पहलों से 4,434 लोगों को लाभ मिला है। वहीं 47 गांवों के 877 लोगों ने कौशल विकास कार्यक्रमों में भाग लिया है। इन पहलों का उद्देश्य खनन गतिविधियों के बाद स्थानीय लोगों के लिए वैकल्पिक आजीविका के रास्ते तैयार करना है।
वर्जन
हमारा प्रयास उर्जा के साथ हरियाली बिछाना
एसईसीएल में माइन क्लोजर खनन का अंत नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत है। हमारा उद्देश्य भूमि को सुरक्षित और पुनर्स्थापित करना, पर्यावरणीय संतुलन को मजबूत करना तथा खनन पूरा हो चुके क्षेत्रों को समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए उपयोगी बनाना है। हमारा प्रयास है कि जहां कभी देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयला निकाला गया, वही भूमि आगे चलकर हरियाली, जल संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और आजीविका के नए अवसरों का आधार बने।
- हरीश दुहन, अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक, एसईसीएल