
नईदुनिया प्रतिनिधि, नारायणपुर। छत्तीसगढ़ के घोर माओवाद प्रभावित अबूझमाड़ में स्वतंत्रता दिवस ने इस बार इतिहास रच दिया। दशकों तक माओवाद हिंसा और भय के साये में रहे अबूझमाड़ के नौ गांवों में आजादी के बाद पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया गया और पूरे सम्मान के साथ तिरंगा फहराया गया।
कोरसकोडो, हचेकोटी, आदनार, बोटेर, कुमनार, दिवालुर, गुंडेकोट, रेकापाल और रासमेटा में तिरंगा लहराते ही ग्रामीणों के चेहरों पर खुशी, गर्व और नए विश्वास की झलक दिखाई दी। कभी जहां लाल आतंक का प्रभाव था, वहां अब भारत माता की जय के उद्घोष के बीच राष्ट्रीय ध्वज आसमान में लहराता नजर आया।
31 मार्च 2026 को क्षेत्र के माओवाद मुक्त होने के बाद यह पहला अवसर है, जब इन गांवों में राष्ट्रीय पर्व खुले तौर पर मनाया गया। वर्षों तक माओवाद प्रभाव के कारण ग्रामीणों के लिए तिरंगा फहराना और राष्ट्रीय पर्व मनाना संभव नहीं था। माओवादियों के फरमान और भय ने ग्रामीणों को देश के राष्ट्रीय उत्सवों से दूर कर दिया था। अब हालात बदलने के साथ ग्रामीण लोकतंत्र और मुख्यधारा से जुड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
नारायणपुर जिला मुख्यालय से करीब 120 किलोमीटर दूर स्थित बोटेर गांव तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है। ओरछा विकासखंड मुख्यालय से लगभग 55 किलोमीटर दूर इस गांव तक कुडमेल पुलिस शिविर तक दोपहिया वाहन से पहुंचा जा सकता है। इसके बाद घने जंगलों, नदी-नालों और कीचड़ भरे पहाड़ी रास्तों से करीब नौ किलोमीटर पैदल सफर करना पड़ता है। लगभग 60 की आबादी वाले इस गांव में पहली बार स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराया जाना ग्रामीणों के लिए बेहद भावुक और गौरवपूर्ण क्षण रहा।
क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के बाद ग्रामीणों में भरोसा बढ़ा है। मार्च 2026 में सुरक्षा शिविर की स्थापना के बाद अबूझमाड़ के दुर्गम गांवों में प्रशासन और सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ी है। पुलिस के अनुसार माओवाद प्रभाव कम होने के साथ ग्रामीणों में राष्ट्रीय पर्व मनाने और विकास की मुख्यधारा से जुड़ने का उत्साह बढ़ रहा है।
बोटेर की अतिथि शिक्षक सुनीता और ग्रामीणों ने बताया कि अब बच्चे स्कूल जा पा रहे हैं और गांव में पहले जैसा डर नहीं है। ग्रामीणों के लिए तिरंगा केवल राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि बदलते माहौल और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद का प्रतीक बनकर सामने आया है।
हालांकि माओवाद का प्रभाव कम होने के बाद माहौल बदला है, लेकिन ग्रामीणों की बुनियादी जरूरतें अभी पूरी तरह दूर नहीं हुई हैं। बोटेर सहित आसपास के गांवों में सड़क, बिजली, स्वास्थ्य सुविधाएं, राशन की उपलब्धता और नियमित शिक्षकों की जरूरत बनी हुई है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि सुरक्षा के बाद अब विकास की पहुंच भी उनके गांवों तक तेजी से पहुंचेगी।
अबूझमाड़ के इन नौ गांवों में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया जाना केवल ध्वजारोहण का कार्यक्रम नहीं रहा। यह लंबे समय तक चले भय से बाहर निकलने, शांति की ओर बढ़ने और लोकतांत्रिक व्यवस्था में ग्रामीणों के बढ़ते विश्वास की तस्वीर बन गया। जिन गांवों में कभी नक्सली झंडों और फरमानों का प्रभाव था, वहां आज भारत का तिरंगा शान से लहरा रहा है।