रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। राजधानी में कोरोना महामारी के दो साल बाद भगवान नृसिंह अवतार का मंचन शनिवार को ब्रम्हपुरी और बूढ़ेश्वर मंदिर में होगा। नृसिंह जयंती पर दोनों मंदिरों से अलग-अलग शोभायात्रा निकाली जाएगी। राजा हिरण्यकश्यप कोड़े बरसाते हुए निकलेंगे।

शोभायात्रा जब वापस मंदिर पहुंचेगी तब दिन और रात की बेला में शाम को भगवान नृसिंह अवतार लेंगे और हिरण्यकश्यप का संहार करेंगे। भगवान नृसिंह की छत्तीसगढ़ में सबसे पुरानी प्रतिमा ब्रह्मपुरी इलाके में स्थित मंदिर में प्रतिष्ठापित है। यह लगभग 1150 साल पुरानी है।

मंदिर में सन 870 के आसपास भोसले राजा हरिहर वंशी ने प्रतिमा की प्राणप्रतिष्ठा करवाई थी। महंत देवदास बताते हैं कि काले पत्थर से बनी नृसिंह प्रतिमा की विशेषता यह है कि गर्मी के मौसम में यह ठंडी और ठंड के मौसम में गर्म रहती है।

एक-एक पत्थर के 10-10 फीट ऊंचे 28 खंभे

नृसिंह मंदिर में एक-एक पत्थर को काटकर 10-10 फीट ऊंचे खंभे बनाए गए हैं। पूरा मंदिर ऐसे 28 खंभों पर टिका है। छत पर विविध कोण बने हैं। हर कोण की डिजाइन अलग है। इसे ताबीज कहा जाता है। कहा जाता है कि इन कोणों के नीचे बैठकर मंत्रोच्चार करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

सुबह दुग्धाभिषेक, भंडारा

श्री बिरंचि नारायण मंदिर ब्रह्मपुरी में भगवान नृसिंह का प्रकट उत्सव पर सुबह 10 बजे दुग्धाभिषेक होगा। दोपहर 12 बजे हवन पूजन होगा। दोपहर एक से शाम चार बजे तक भोजन प्रसादी के बाद शाम को 4:30 बजे से शोभायात्रा निकलेगी।

विरंचि-नारायण की प्रतिमा

मंदिर में काले पत्थरों से क्षीर सागर में विश्राम कर रहे भगवान विष्णु और उनकी नाभि से निकले पुष्प पर विराजित विरंचि (ब्रह्मा) एवं भगवान विष्णु के चरण दबाते हुए माता लक्ष्मी की आकर्षक प्रतिमा भी प्रतिष्ठापित है। इस प्रतिमा पर 11 नाग फन फैलाए हुए हैं। संपूर्ण प्रतिमा एक ही पत्थर से निर्मित की है।

17 महंतों का लिखित इतिहास

मंदिर में अनेक महंतों ने सेवा दी है, लेकिन मंदिर के लिखित इतिहास के अनुसार सात पीढ़ी के नाम ही दर्ज हैं। उनमें प्रमुख रूप से महंत रामनारायण दास, महंत सरजूदास, महंत गिरधारी दास, महंत सेवादास, महंत रघुवीर दास, महंत बिहारी दास के नाम प्रमुख हैं। वर्तमान में 17वें महंत के रूप में महंत देवदास सेवा दे रहे हैं।

बूढ़ेश्वर मंदिर का मंचन आकर्षण का केंद्र

बूढ़ा तालाब के सामने स्थित बूढ़ेश्वर मंदिर में 100 साल से नृसिंह लीला का मंचन किया जा रहा है।

नृसिंह और हिरण्यकश्यप का मंचन देखने के लिए हजारों लोग मंदिर में आते हैं। बरगद वृक्ष के नीचे मंचन होता है और संध्या बेला में मंदिर की मुख्य चौखट पर भगवान नृसिंह अपनी गोद में हिरण्यकश्यप को लिटाकर संहार करते हैं। भक्त प्रल्हाद और नृसिंह के जयकारे के बाद महाआरती, प्रसाद वितरण से समापन होता है।

115 साल पुराना है नृसिंह, हिरण्यकश्यप का मुखौटा

मंदिर के ट्रस्टी परसराम वोरा बताते हैं कि मंचन के दौरान पहने जाने वाले भगवान नृसिंह और हिरण्यकश्यप के मुखौटे 115 साल पुराने हैं। इन मुखौटों को मुल्तान के कारीगरों ने बनाया था। इन्हें कागज की लुगदी से तैयार किए गए हैं।

पाताल, स्वर्ग, धरती लोक में लड़ाई

20 सालों से हिरण्यकश्यप का रूप धारण कर रहे श्री रायपुर पुष्टिकर समाज के सदस्य राजकुमार व्यास बताते हैं कि पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार भक्त प्रल्हाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का संहार किया था। मान्यता है कि नृसिंह और हिरण्यकश्यप का युद्ध पाताल, स्वर्ग और धरती लोक में हुआ था।

हिरण्यकश्यप को वरदान था कि उसकी मत्यु न दिन में होगी न रात में, न धरती में न आकाश में, न शस्त्र से होगी न अस्त्र से, न इंसान के हाथों, न जानवर के हाथों, न घर के भीतर, न घर के बाहर होगी। इस वरदान के फलस्वरूप भगवान ने इंसान और जानवर का मिलाजुला नृसिंह रूप धारण किया। दिन और रात की संध्या बेला में महल के दरवाजे पर बिना अस्त्र-शस्त्र के अपने नाखूनों से धरती और आकाश के बीच अपनी गोद पर लिटाकर छाती चीरकर संहार किया।

कई पूर्व नेता निभा चुके हैं, नृसिंह और हिरण्यकश्यप की भूमिका

मंचन में कई पूर्व जनप्रतिनिधियों ने नृसिंह और हिरण्यकश्यप की भूमिका निभाई है। हिरण्यकश्यप की भूमिका निभाने वालों में रायपुर के पूर्व उपमहापौर, आरडीए अध्यक्ष रह चुके स्व. गंगा राम शर्मा, उनके पिता स्व. उदयनारायण शर्मा, भाई देवीदयाल शर्मा, पूर्व पार्षद शंकर व्यास, मदन गोपाल पुरोहित, राजेंद्र वोरा, अशोक पुरोहित, अनंत व्यास समेत अनेक प्रसिद्ध हतियां शामिल हैं। भगवान नृसिंह की भूमिका स्व. चंपालाल शर्मा, हनुमान प्रसाद व्यास, दाऊलाल ओझा ने कई सालों तक निभाई। पिछले कुछ सालों से रमेश पुरोहित नृसिंह और राजकुमार व्यास हिरण्यकश्यप की भूमिका कर रहे हैं।

Posted By: Ravindra Thengdi

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