रायपुर। अंग्रेजों और गुंडाधुर के बीच हुए युद्ध बस्तर में आज भी याद किए जाते हैं। भतरानाट के माध्यम से गुंडाधुर की वीरता का वर्णन आदिवासी करते हैं। गुंडाधुर की वीरता की कहानी शनिवार को संस्कृति विभाग के मुक्ताकाशी मंच पर देखने को मिली। यहां आयोजित आदि परब कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ सहित देश के अन्य राज्यों की असीम सांस्कृतिक विरासत शनिवार को देखने को मिली। बस्तर से आए कलाकारों ने अंग्रेजों और गुंडाधुर के बीच हुए युद्ध को भतरानाट के माध्यम से प्रस्तुत किया। इसे सुख और दुख दोनों ही अवसरों पर प्रस्तुत किया जाता है। बस्तर की इस परंपरा को आज भी यहां के आदिवासी जीवित रखे हुए हैं।

मध्यप्रदेश से आए कलाकारों ने कोलदहका नृत्य की शानदार प्रस्तुति से सभी का दिल जीत लिया। कोलदहका एक प्राचीन परंपरा है, जिसमें बघेली बोली में सवाल-जवाब के माध्यम से नृत्य गीत प्रस्तुत किया जाता है। यह छत्तीसगढ़िया ददरिया की ही तरह है। खुशी आदि के अवसर पर किए जाने वाला यह नृत्य अक्सर पशुधन की प्राप्ति पर ग्रामीण मिलकर करते हैं।

इन नृत्य विधाओं के अलावा छत्तीसगढ़ के लोहाटी बाजा, गौर नृत्य, मध्यप्रदेश का कर्मा, झारखंड का पादका, महाराष्ट्र की गेड़ी सहित तेलंगाना भोनालू नृत्य मुख्य आकर्षक के केंद्र रहे। रविवार को तीन दिवसीय आदि परब का समापन होगा। रविवार को भी छत्तीसगढ़ सहित देश के अन्य राज्यों से आए पारंपरिक नृत्य के कलाकार प्रस्तुति देंगे।

छत्तीसगढ़ के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा

आदि परब के तहत सुबह के सत्र में भारतीय पुरालिपि परिषद के 40वें और भारतीय स्थान नाम परिषद के 34वें संयुक्त अधिवेशन तथा छत्तीसगढ़ के पुरालिपि के क्षेत्र के नवीनतम शोध कार्यों पर आधारित संगोष्ठी के दूसरे दिन विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई। संगोष्ठी के दूसरे दिन 30 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। संगोष्ठी में दिल्ली, असम, कर्नाटक, नागपुर, कोलकाता और लखनऊ से आए विशेषज्ञों ने विभिन्न विषयों पर अपनी बात रखी।

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