रायपुर। Aiims News : एम्स में कृत्रिम अंग की सुविधा शुरू कर दी गई है। पहले दिन पांच मरीजों में निश्शुल्क कृत्रिम पैर लगाए गए हैं। इसमें सेरिब्रल पाल्सी से पीड़ित दो बालिकाओं, पोलियो से ग्रसित एक छात्रा और दो दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंग प्रदान किए।
बता दें कि एम्स के फिजिकल मेडिसिन एंड रिहेब्लिटेशन विभाग (पीएमआर) में प्रोस्थेसिस एंड आर्थोसिस कार्यशाला शुरू की गई है। इसकी मदद से विभिन्न् बीमारियों से शारीरिक क्षमता को खोने वाले और दुर्घटना का शिकार रोगियों के लिए कृत्रिम अंगों का निर्माण किया जाएगा।
एम्स के डायरेक्टर डा. नितिन एम नागरकर ने नईदुनिया से बातचीत में बताया कि अस्पताल में कई ऐसे मरीज आते थे, जो दुर्घटना की वजह से हाथ, पैर खो चुके होते थे। इलाज तो किया जाता था, लेकिन कृत्रिम अंग बाहर से मंगाए जाते थे या फिर उन्हें रेफर किया जाता था।
मरीजों की सुविधाओं को देखते हुए एम्स में पीएमआर विभाग में कार्यशाला बनाई गई। विशेषज्ञ यहां से मरीजों के लिए कृत्रिम अंग बनाकर उन्हें नया जीवन देंगे। हाल ही में पांच लोगों की सुविधा का लाभ मिला है। सभी को पैर और सहायक अंग लगाए गए हैं।
मध्यभारत की पहली कार्यशाला
एम्स प्रबंधन से मिली जानकारी के मुताबिक एम्स के पीएमआर विभाग में प्रोस्थेसिस एंड आर्थोसिस अपने तरह की पहली कार्यशाला है। कार्यशाला में मरीजों के लिए कृत्रिम अंग का निर्माण होगा। इसके लिए चिकित्सा कर्मियों को भी पूरी तरह ट्रेनिंग दी जा चुकी है। विभाग की डा. जयदीप नंदी ने बताया कि विभाग में बड़ी संख्या में दिव्यांगजन नियमित दिनचर्या व्यतीत करने के लिए चिकित्सकों से संपर्क करते हैं। कार्यशाला बन जाने के बाद अब इन रोगियों को यहीं पर कृत्रिम अंग बनाकर दिए जा सकेंगे।
कार्यशाला की शुभारंभ के बने गवाह
एम्स में कृत्रिम अंग बनाने वाली प्रोस्थेसिस एंड आर्थोसिस कार्यशाला का शुभारंभ मंगलवार को किया गया है। इस दौरान एम्स डायरेक्टर डा. नितिन एम नागरकर के अलावा डा. मनीषा रूइकर, डा. अजाय बेहरा, डा. अंजन गिरी, डा. रमेश चंद्राकर, विभाग के बीरेश कुमार, डा. रौनक, डा. सुशील, चंद्रकांत, डा. आराधना शुक्ला, शालिनी सिंघल, स्नेहांजलि जेना, नरसिम्हा, राहुल शर्मा आदि मौजूद रहे।
एम्स के डायरेक्टर डा. नितिन एम नागरकर ने बताया कि कृत्रिम अंग एम्स में बना कार्यशाला मध्यभारत की पहली कार्यशाला है। मरीजों को विभिन्न् सामाजिक योजनाओं के अंतर्गत कृत्रिम अंग बहुत ही कम लागत पर उपलब्ध कराई जाएगी। इसकी मदद से प्रदेश के अन्य चिकित्साकर्मियों को भी प्रशिक्षण प्रदान किया जा सकेगा। कृत्रिम अंग लगवाने वालों के लिए जांच और पंजीयन की व्यवस्था भी शुरू कर दी गई है।