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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 30, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Raipur Local Edit: छत्तीसगढ़ में नक्सल मनोविज्ञान पर प्रहार के आ रहे हैं सकारात्मक नतीजे

नक्सली ग्रामीण इलाके के बच्चों को अपना औजार बनाते हैं। उन्हें खेलने, घूमने, नाचने व गाने के नाम पर अपने साथ ले जाते हैं।

By Shashank.bajpaiEdited By: Shashank.bajpai
Publish Date: Thu, 30 Sep 2021 10:16:52 AM (IST)Updated Date: Thu, 30 Sep 2021 10:16:52 AM (IST)
Raipur Local Edit: छत्तीसगढ़ में नक्सल मनोविज्ञान पर प्रहार के आ रहे हैं सकारात्मक नतीजे

रायपुर। Raipur Local Edit: नक्सलवाद से जूझते बस्तर में समस्या समाधान के लिए चौतरफा प्रयास कामयाबी की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। नक्सली पहले गुरिल्ला युद्ध यानी छिपकर हमला करते थे। पुलिस ने उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब देना शुरू किया तो नक्सलियों ने गुरिल्ला युद्ध से तौबा कर ली। इसके बाद उन्होंने फोर्स को ट्रेप करने, यानी जाल में फंसाने की नीति अपनाई तो जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने नक्सल कैंप को घेरना चालू किया। सरकार ने पहुंचविहीन इलाकों तक सुरक्षा के साये में सड़कें बनवा दीं। अब पुलिस ने नक्सलियों के लिए जो नया इलाज तैयार किया है उसका नाम है ब्रेन मैपिंग।

इस प्रयोग के बाद यह साबित हो गया है कि नक्सली यदि डाल-डाल हैं तो पुलिस पात-पात। नक्सली ग्रामीण इलाके के बच्चों को अपना औजार बनाते हैं। उन्हें खेलने, घूमने, नाचने व गाने के नाम पर अपने साथ ले जाते हैं। कुछ समय के बाद ऐसे बच्चों को अपनी विचारधारा में ढाल देते हैं। उनके दिमाग के साथ खेलते हैं व उनकी सोच पर हावी हो जाते हैं। ऐसे युवा जो मुख्यधारा से कट जाते हैं, उन्हें नक्सली अपनों तक भी लौटने नहीं देते। सोचिए अगर किसी बुजुर्ग मां-बाप का इकलौता बेटा बंदूक थामकर हमेशा के लिए घर से चला जाए तो उन पर क्या बीतती होगी।


पुलिस ने समस्या की जड़़ तक पहुंचने के लिए मनोविज्ञान का सहारा लिया है। दंतेवाड़ा के एसपी, मनोचिकित्सा विज्ञानी डा. अभिषेक पल्लव ने नक्सलियों के मनोविज्ञान को समझकर समस्या समाधान की विस्तृत योजना बनाई है। इस मनोवैज्ञानिक लड़ाई के नतीजे भी आने लगे। दंतेवाड़ा पुलिस नक्सलियों के घरों तक पहुंची। उनके माता-पिता व अन्य लोगों से मुलाकात कर उनका हालचाल लिया। मदद दी। परिणाम यह रहा कि एक साल में ही दंतेवाड़ा जिले में 440 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं।

पुलिस ने आत्मसमर्पित नक्सलियों पर मनोवैज्ञानिक प्रयोग किए, जिससे समस्या की तह तक जाने का रास्ता खुलने लगा है। अब वैज्ञानिक आधार पर तैयार की गई प्रश्नोत्तरी के जरिए पुलिस आत्मसमर्पण कर चुके इनामी नक्सलियों का मन समझने की कोशिश कर रही है। सर्वे से पता चला कि दस ऐसे गांव हैं, जहां के बच्चे नक्सल संगठन में जा रहे हैं।

पुलिस के प्रयासों से समस्या के समाधान तक पहुंचने का जरिया भी मिलने लगा है। अध्ययन में पता चला कि 70 फीसद लोग भय के चलते नक्सली बनते हैं। बाद में उन्हें अपने मां-बाप को कंधा देने तक की अनुमति नहीं मिलती। इस समझ के आधार पर नक्सल चुनौती से निपटने की योजना बनाई जा रही है। लगातार पैंतरा बदलने वाले नक्सलियों के दिन लद गए हैं। नई पीढ़ी सजग हुई तो नक्सलवाद का नामोनिशान मिटते देर नहीं लगेगी।