
नईदुनिया प्रतिनिधि, भिलाई। भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी ) से कथित लोहा-स्क्रैप चोरी के मामले की जांच अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के हाथ में है। 25 सितंबर 2026 को राज्य सरकार की सहमति के बाद सीबीआई को इस प्रकरण की जांच का अधिकार मिला है। अब तक पुलिस की जांच में 250 टन के आसपास लौह स्क्रैप बरामद होने और 21 आरोपितों की गिरफ्तारी की बात सामने आई है। ऐसे में सीबीआई के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि बरामदगी और गिरफ्तारियों के पीछे चोरी का नेटवर्क कितना बड़ा है।
सीबीआई की जांच में सबसे पहले यह पता लगाने पर जोर हो सकता है कि बीएसपी के भीतर से स्क्रैप बाहर कैसे निकाला जाता था। पुलिस की जांच में फ्लू डस्ट ले जाने वाले वाहनों में कथित रूप से लोहे की सामग्री छिपाकर बाहर ले जाने की बात सामने आई है। इसलिए संबंधित विभागों के रिकार्ड, गेट पास, वाहनों की आवाजाही, वजन पर्ची, डिस्पैच दस्तावेज और सीसीटीवी फुटेज महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।
जांच का दायरा केवल पहले से गिरफ्तार आरोपितों तक सीमित रहने के बजाय यह पता लगाने तक बढ़ सकता है कि प्लांट के भीतर सामग्री की पहचान, लोडिंग और बाहर निकलने की प्रक्रिया में किस-किस स्तर पर लापरवाही या कथित मिलीभगत हुई। इसके साथ ठेका एजेंसियों, ट्रांसपोर्टरों, वाहन मालिकों, ड्राइवरों, स्क्रैप कारोबारियों और निजी औद्योगिक इकाइयों की भूमिका भी जांची जा सकती है।
पुलिस की अब तक की जांच में प्लांट से सामग्री निकलने के बाद उसके भंडारण और निजी औद्योगिक इकाई तक पहुंचने की कड़ी सामने आने की जानकारी है। सितंबर में एक निजी कंपनी के प्रबंध निदेशक और निदेशक की गिरफ्तारी के बाद जांच का दायरा खरीदार और अंतिम उपयोगकर्ता तक भी पहुंचा है।
26 मई को अकलोरडीह-खदानपारा क्षेत्र में ए.के. ट्रेडर्स के परिसर से करीब 250 टन लौह सामग्री बरामद होने के बाद मामला सामने आया था। पुलिस ने स्क्रैप के साथ ट्रक, हाईवा, क्रेन, जेसीबी और अन्य मशीनरी भी जब्त की थी। पुलिस के अनुसार बरामद स्क्रैप की कीमत करीब 90 लाख रुपये और स्क्रैप, वाहनों व मशीनरी की कुल अनुमानित कीमत करीब 3.22 करोड़ रुपये थी।
अब सीबीआइ यह भी जांच सकती है कि बरामद सामग्री पूरे नेटवर्क का हिस्सा थी या चोरी की कथित गतिविधि इससे कहीं अधिक व्यापक थी। इसके लिए पुराने स्टॉक रिकॉर्ड, स्क्रैप डिस्पोजल, उत्पादन एवं खपत के आंकड़े और संबंधित विभागों के रिकॉर्ड का मिलान किया जा सकता है।
मामले में बड़े आर्थिक नुकसान के दावे भी सामने आए हैं, लेकिन वास्तविक नुकसान की राशि अभी जांच का विषय है। सीबीआई दस्तावेजों, स्टाक रिकार्ड, बरामद सामग्री के मूल्य, कथित बिक्री और लेन-देन की जांच के आधार पर यह निर्धारित कर सकती है कि संयंत्र को वास्तविक आर्थिक नुकसान कितना हुआ। इसके लिए बैंक खातों, भुगतान, बिल, परिवहन दस्तावेज, डिजिटल रिकार्ड और अन्य वित्तीय साक्ष्यों की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है। साथ ही मोबाइल और अन्य डिजिटल साक्ष्यों से आरोपितों के बीच संपर्क और कथित नेटवर्क की कड़ियों की भी पड़ताल की जा सकती है।
सीबीआई जांच के सामने तीन अहम सवाल होंगे—बीएसपी से सामग्री बाहर कैसे निकली, किस नेटवर्क के माध्यम से उसका परिवहन और भंडारण हुआ तथा आखिर उसे किसने खरीदा या इस्तेमाल किया। जांच आगे बढ़ने पर नए नाम सामने आते हैं या नहीं, यह साक्ष्यों और पूछताछ से स्पष्ट होगा। फिलहाल 250 टन की बरामदगी और 21 गिरफ्तारियां इस मामले में अब तक सामने आए प्रमुख तथ्य हैं, इससे आगे की किसी भी भूमिका या व्यापक नुकसान का निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही निकलेगा।