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100 रुपये की झूठी रिश्वत का दाग… 39 साल बाद भी न्याय अधूरा; रायपुर के 83 वर्षीय कर्मचारी अधिकारियों के लगा रहे चक्कर

रायपुर के 83 वर्षीय जागेश्वर प्रसाद अवधिया पिछले कई दशकों से न्याय और अपने वैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वर्ष 1986 में केवल 100 रुपये की ...और पढ़ें

By Saurab MishraEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Fri, 12 Dec 2025 01:25:23 AM (IST)Updated Date: Fri, 12 Dec 2025 01:25:23 AM (IST)
100 रुपये की झूठी रिश्वत का दाग… 39 साल बाद भी न्याय अधूरा; रायपुर के 83 वर्षीय कर्मचारी अधिकारियों के लगा रहे चक्कर
महज 100 रुपये की रिश्वत के झूठे आरोप ने रायपुर के 83 वर्षीय जागेश्वर का जीवन बदल दिया। File Photo

HighLights

  1. विभाग भुगतान में देरी कर रहा
  2. MP-छत्तीसगढ़ भ्रम फैलाया गया
  3. 24 साल से अधिकारों के लिए संघर्ष

नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर: सिर्फ 100 रुपये की झूठी रिश्वत के आरोप ने राजधानी रायपुर के 83 वर्षीय जागेश्वर प्रसाद अवधिया का पूरा जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया। वर्ष 1986 में उनके विरुद्ध रिश्वत लेने का मामला दर्ज हुआ, जिसके चलते वे लगभग छह वर्ष तक निलंबित रहे। इस अवधि में न केवल उनका प्रमोशन रुका, बल्कि इंक्रीमेंट और अन्य सभी लाभ भी बंद हो गए। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जब हाईकोर्ट ने उन्हें पूरी तरह बरी कर दिया, तब भी उनकी मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं।

अवधिया ने 29 सितंबर 2025 को छत्तीसगढ़ अधोसंरचना विकास निगम (CIDC) के प्रबंध निदेशक को पत्र भेजकर सस्पेंशन अवधि की कटौती, पेंशन और अन्य लंबित वित्तीय भुगतान कुल लगभग 30 लाख रुपये जारी करने की मांग की। लेकिन तीन महीने बीतने के बाद भी विभागीय अधिकारी “सर्विस बुक नहीं मिलने” का कारण बताकर उन्हें लगातार टालते आ रहे हैं। परिजनों का आरोप है कि अधिकारी कभी उन्हें अकेले में मिलने बुलाते हैं, तो कभी मुलाकात से ही बचते हैं।


विभाग की दलीलें खुद एक-दूसरे से उलझीं

CIDC का कहना है कि अवधिया वर्ष 2001 में जिस समय सेवानिवृत्त हुए, तब वे मध्यप्रदेश सड़क परिवहन निगम के कर्मचारी थे, इसलिए भुगतान वहीं से होना चाहिए। लेकिन विडंबना यह है कि वर्ष 2004 में सीआइडीसी ने ही उनके रिटायरमेंट से संबंधित भुगतान जारी किया था। इसके अलावा 21 नवंबर 2025 को मध्यप्रदेश सड़क परिवहन निगम ने यह लिखित रूप से स्पष्ट कर दिया कि जागेश्वर अवधिया सीआइडीसी के ही कर्मचारी माने जाएंगे और सभी प्रकार का भुगतान उसी विभाग द्वारा किया जाना चाहिए। इसके बावजूद सीआइडीसी कोई ठोस जवाब देने में असमर्थ है।

“24 साल से पाई-पाई के लिए भटक रहा हूं”

अवधिया बताते हैं कि निलंबन के कारण उनका प्रमोशन रुक गया और बच्चों की पढ़ाई तक बाधित हो गई। उन पर लगे रिश्वत के आरोप से उनकी पत्नी मानसिक तनाव में रहती थीं और अंततः दुनिया छोड़ गईं। रिटायरमेंट के बाद पेंशन न मिलने पर उन्हें परिवार चलाने के लिए चौकीदारी तक करनी पड़ी। अब 83 वर्ष की उम्र में भी वे विभागीय दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं, जहाँ उन्हें केवल “सर्विस बुक नहीं मिली” जैसे बहाने सुनने पड़ते हैं।

राज्य विभाजन का बहाना बनाकर उलझाया जा रहा मामला

अवधिया पर 1986 में रिश्वत का आरोप लगा और उन्हें वर्ष 1988 से 1994 तक निलंबित रखा गया। निलंबन समाप्त होने के बाद उनकी पदस्थापना रीवा में की गई। बाद में उनका स्थानांतरण रायपुर हुआ। वे नौ मई 2001 को 58 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हुए। छत्तीसगढ़ राज्य का गठन वर्ष 2000 में हुआ और 31 दिसंबर 2002 को छत्तीसगढ़ परिवहन निगम के कर्मचारियों का सीआइडीसी में विलय कर दिया गया।

इसके बाद से उनके सभी दस्तावेज और भुगतान की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से सीआइडीसी की थी। इसके बावजूद उन्हें कभी “मध्यप्रदेश का कर्मचारी” तो कभी “छत्तीसगढ़ का कर्मचारी” बताकर जानबूझकर भ्रमित और परेशान किया जाता रहा।