
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया. रायपुर। शहरों के नालों से बहकर नदियों और तालाबों तक पहुंचने वाला गंदा पानी पर्यावरण की सेहत बिगाड़ रहा है। इस पर लगाम लगाने के लिए प्रदेश के एक लाख से कम आबादी वाले 173 नगरीय निकायों में 945.68 करोड़ रुपये से नेचर-बेस्ड सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बनाए जाएंगे। इन संयंत्रों से रोज 308.80 एमएलडी गंदे पानी का शोधन करने का लक्ष्य है।
इससे नदियों, तालाबों और जलस्रोतों में गंदगी का बहाव रोकने के साथ शोधित पानी का उपयोग सिंचाई और बागवानी में भी किया जा सकेगा। हालांकि, 102 परियोजनाओं को मंजूरी मिलने के बावजूद 50 अब भी निविदा प्रक्रिया में हैं और 52 पर ही काम चल रहा है। ऐसे में नदियों को गंदगी से बचाने वाली इस ‘दवा’ का असर जमीन पर दिखने का इंतजार है।
अभी इन शहरों का गंदा पानी नालों के जरिये सीधे नदियों, तालाबों और खेतों तक पहुंचता है। स्वच्छ भारत मिशन शहरी 2.0 के तहत पहले चरण में 149 नगरीय निकायों के लिए 829.37 करोड़ रुपये की योजना बनाई गई है। इसमें 151.53 एमएलडी क्षमता की 102 परियोजनाओं को मंजूरी मिली है। इन पर 480.26 करोड़ रुपये खर्च होंगे। फिलहाल 52 परियोजनाओं पर काम चल रहा है, जबकि 50 निविदा प्रक्रिया में हैं।
दो निकायों की 126.63 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को राज्य तकनीकी समिति की अनुशंसा मिल चुकी है। अब इन्हें स्वीकृति के लिए राज्य उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एसएचपीसी) के समक्ष रखने की तैयारी है। वहीं, 17 निकायों की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) की तकनीकी जांच चल रही है और 10 की रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
18 नगरीय निकायों में 92.74 करोड़ रुपये की लागत से 29.50 एमएलडी क्षमता के प्लांट बनाने के लिए सरकारी जमीन चिह्नित की जा रही है। दूसरी ओर, दूसरे चरण में 24 निकायों के लिए 20.02 एमएलडी क्षमता के प्लांट बनाने के लिए 116.31 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। इनकी परियोजना रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
प्रकृति के सहारे गंदे पानी का उपचार। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों में एरेटेड लैगून तकनीक अपनाई जा रही है, जो प्रकृति आधारित और कम खर्च वाली पद्धति है। इसमें बड़े पैमाने पर जटिल मशीनों के बजाय तालाबनुमा संरचनाओं में हवा पहुंचाकर सूक्ष्मजीवों की मदद से गंदे पानी में मौजूद जैविक गंदगी को तोड़ा जाता है। इससे पानी को साफ करने की प्रक्रिया में मदद मिलती है। पारंपरिक तकनीकों की तुलना में इसमें मशीनरी की जरूरत और बिजली की खपत कम होती है। इससे संयंत्रों के संचालन एवं रखरखाव (ओएंडएम) पर होने वाला खर्च कम होता है।
पांच साल तक ठेकेदार संभालेंगे रखरखाव। एसटीपी के निर्माण के बाद संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी पांच साल तक ठेकेदारों की होगी। अधिकारियों का कहना है कि निविदा में यह शर्त रखी गई है, ताकि संयंत्रों का संचालन सुचारु रहे और निर्माण की गुणवत्ता के साथ रखरखाव की जवाबदेही भी तय हो सके। ठेकेदारों को संयंत्रों की नियमित निगरानी, जरूरी मरम्मत और संचालन सुनिश्चित करना होगा।
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स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के तहत लक्ष्य है कि प्रदेश के छोटे शहर भी गंदे पानी के प्रबंधन में बड़े शहरों के बराबर हों। कम लागत और कम रखरखाव वाली नेचर-बेस्ड तकनीक चुनने से ये प्लांट निकायों के लिए लंबे समय तक टिकाऊ रहेंगे। परियोजनाओं की नियमित निगरानी की जा रही है, ताकि निर्माण कार्य गुणवत्ता के साथ तय समय में पूरा हो। - सुमित अग्रवाल, सीईओ, राज्य शहरी विकास अभिकरण (सूडा)