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राहुल गांधी का व्यवहार 'जो मैं कहूं, वही सही' हठधर्मिता है, इससे संवैधानिक संस्थाओं को खतरा- अधिवक्ता नरेश चंद्र

भाजपा विधि प्रकोष्ठ के पूर्व संयोजक और वरिष्ठ अधिवक्ता नरेश चंद्र गुप्ता ने विपक्ष द्वारा संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों की क...और पढ़ें

By Sandeep TiwariEdited By: Paritosh Dubey
Publish Date: Sat, 10 Oct 2026 02:52:00 PM (IST)Updated Date: Sat, 10 Oct 2026 02:53:44 PM (IST)
राहुल गांधी का व्यवहार 'जो मैं कहूं, वही सही'  हठधर्मिता है, इससे संवैधानिक संस्थाओं को खतरा- अधिवक्ता नरेश चंद्र
वरिष्ठ अधिवक्ता नरेश चंद्र गुप्ता। अर्काइव

HighLights

  1. संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा गिराना लोकतंत्र हेतु खतरनाक
  2. चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर सवाल उठाना गलत
  3. विरोध प्रदर्शनों में गरिमा और अनुशासन की जरूरत

राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, रायपुर। भाजपा विधि प्रकोष्ठ के पूर्व संयोजक और वरिष्ठ अधिवक्ता नरेश चंद्र गुप्ता ने कांग्रेस का नाम लिए बिना निर्वाचन आयोग के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र है। इसकी मजबूती चुनावी जीत-हार से ही नहीं, बल्कि उच्चतम न्यायालय, निर्वाचन आयोग, संसद और जांच एजेंसियों जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर नागरिकों तथा राजनीतिक दलों के भरोसे से तय होती है।

गुप्ता के अनुसार, हाल के वर्षों में विरोध के बदलते तौर-तरीकों ने यह चिंता बढ़ाई है कि क्या सत्ता की होड़ में राष्ट्रहित और संस्थागत मर्यादा पीछे छूट रही है। बतादें कि कांग्रेस लगातार प्रदर्शन कर रही है। राज्य से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी दिल्ली पहुंचकर प्रदर्शन किया।


मतभेद की गरिमापूर्ण परंपरा

गुप्ता ने कहा कि भारतीय राजनीति में मतभेद और विरोध की एक गरिमापूर्ण परंपरा रही है। जनसंघ और भाजपा के दौर से लेकर पूर्ववर्ती सरकारों के समय तक विपक्षी दल धरने-प्रदर्शन करते थे, लेकिन वे आम तौर पर सांकेतिक और अनुशासित होते थे। नेता निर्धारित स्थलों पर बैठकर वैचारिक तथा संसदीय भाषा में अपनी बात रखते और कानून का सम्मान करते हुए सांकेतिक गिरफ्तारियां देते थे।

प्रशासनिक व्यवस्था की साख प्रभावित

उनके मुताबिक, अब विरोध-प्रदर्शनों के दौरान संसद, अति-सुरक्षित परिसरों या प्रधानमंत्री आवास की ओर उग्र मार्च, सुरक्षा बलों और पुलिस अधिकारियों से धक्का-मुक्की तथा सार्वजनिक व्यवस्था बाधित करने की कोशिशें देखने को मिल रही हैं। गुप्ता ने कहा कि मुख्यमंत्री, मंत्री और सांसद जैसे जनप्रतिनिधि जब कानून-व्यवस्था को चुनौती देते दिखते हैं, तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था की साख प्रभावित होती है।

विश्वसनीयता कम करने की कोशिश

उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं पर उठाए जा रहे सवालों को भी चिंताजनक बताया। गुप्ता के अनुसार, सर्वोच्च अदालत अंतरिम राहत देने से मना करे या साक्ष्यों के आधार पर निर्णय दे, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए जाते हैं। इसी तरह निर्वाचन आयोग, सीबीआई, ईडी और सीएजी पर वैधानिक प्रक्रिया के तहत काम करने के बावजूद एकतरफा होने के आरोप लगाकर उनकी विश्वसनीयता कम करने की कोशिश होती है।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है असर

गुप्ता ने भारतीय राजनीति के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि जब व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं देशहित से ऊपर रखी जाती हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर पड़ता है। उन्होंने 1946 के सत्ता हस्तांतरण के दौर का हवाला दिया, जब उनके अनुसार प्रांतीय कमेटियों के स्पष्ट बहुमत, जो सरदार पटेल के पक्ष में था, को नकारकर पंडित जवाहरलाल नेहरू की इस जिद को प्राथमिकता दी गई कि वे किसी अन्य के अधीन काम नहीं करेंगे। गुप्ता ने इसे राष्ट्रहित के ऊपर व्यक्तिगत पद को रखने का उदाहरण बताया।

राहुल का हठधर्मी व्यवहार

उन्होंने कहा कि आठ दशकों बाद वही प्रवृत्ति राहुल गांधी के राजनीतिक रवैये में दिखाई देती है। उनके अनुसार, नेता प्रतिपक्ष का महत्वपूर्ण संवैधानिक पद मिलने के बावजूद राहुल गांधी का व्यवहार “जो मैं कहूं, वही सही है” वाली हठधर्मिता दर्शाता है। गुप्ता ने आरोप लगाया कि चुनी हुई सरकार के अस्तित्व को खारिज करना, संसद के काम में लगातार गतिरोध पैदा करना और प्रतिकूल न्यायिक फैसलों के बाद संस्थाओं पर सवाल उठाना देश में वैचारिक तथा सामाजिक अराजकता को बढ़ावा देता है। उनके मुताबिक, हालिया घटनाक्रम राजनीतिक हताशा और संवैधानिक प्रक्रियाओं की अवहेलना को उजागर करते हैं।