
रायपुर। छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के पहले चरण की 18 सीटों के लिए बिसात बिछ गई है। चौसर पर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस के साथ ही अन्य दलों ने भी अपने मोहरे आगे बढ़ा दिए हैं।
शह और मात के इस खेल में इस बार सत्तास्र्ढ़ दल ने अपने एक और कांग्रेस ने तीन विधायकों का टिकट काट दिया है। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जकांछ), बसपा और सीपीआई गठबंधन भी इस बार मैदान में है। वहीं, दोनों प्रमुख दलों से बागी हुए नेताओं के साथ दूसरे निर्दलीय भी जोर आजमा रहे हैं।
बादशाह के साथ दो वजीरों की भी किस्मत होगी तय
पहले चरण में ही भाजपा के बादशाह यानी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह व दो वजीरों केदार कश्यप और महेश गागड़ा की भी किस्मत तय होगी। डॉ. सिंह मुख्यमंत्री बनने के बाद 2004 में डोंगरगांव उपचुनाव के जरिये सदन पहुंचे थे। 2008 में वे राजनांदगांव सीट से चुनाव लड़े थे। करीब 32 हजार वोट के अंतर से जीत कर सदन पहुंचे। पिछले चुनाव में करीब 35 हजार वोट के अंतर से जीते। इस बार कांग्रेस ने अटल साहनुभूति की चाल के तहत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की भतीजी कस्र्णा शुक्ला पर दांव लगाया है।
वहीं, नारायणपुर से मंत्री केदार कश्यप और बीजापुर से महेश गागड़ा मैदान में हैं। कश्यप लगातार तीन बार के विधायक हैं। पिछला चुनाव चंदन कश्यप से बमुश्किल पांच हजार वोट के अंतर से जीत पाए थे। यही वजह है कि कांग्रेस ने फिर चंदन को ही प्रत्याशी बनाया है। गागड़ा लगातार दूसरी बार के विधायक हैं। पिछला चुनाव करीब नौ हजार के अंतर से जीते थे। इस बार उन्हें कांग्रेस से ज्यादा पार्टी के बागी राजाराम तोड़म से खतरा है।
कांग्रेस से ज्यादा भाजपा में बगावत
पहले चरण की कुछ सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों को बगावत का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस ने कांकेर से शंकर धु्रवा का टिकट काटा तो वे बागी हो गए, लेकिन पार्टी ने समय रहते उन्हें मना लिया। हालांकि दंतेवाड़ा में अपनी ही मां के खिलाफ ताल ठोक चुके छविंद्र कर्मा को पार्टी अब तक मना नहीं पाई है। दंतेवाड़ा में भाजपा को भी बगावत का सामना करना पड़ रहा है। वहां भाजपा के चैतराम अटामी ने पर्चा दाखिल कर दिया है। इसी तरह भाजपा के बर्खास्त राजा राम तोड़म ने भी ताल ठोंक दिया है। केशकाल में भी भाजपा को बगावत का सामना करना पड़ रहा है। नाम वापसी में अभी एक दिन का वक्त है, इस वजह से मनौव्वल का दौर भी चल रहा है।
नए चेहरों पर दांव
कांग्रेस ने पहले चरण में राजनांदगांव जिले की मोहला-मानपुर और खुज्जी के अपने विधायकों के टिकट काटकर नए चेहरों को मैदान में उतारा है। इसी तरह कांकेर सीट पर भी मौजूदा विधायक का टिकट काटकर नए पर ही दांव खेला है। कांग्रेस में ऐसा पहली बार हुआ है। टिकट काटने में आगे रहने वाली भाजपा ने अपने पहले चरण में इस तरह का जोखिम नहीं लिया है। केवल एक अंतागढ़ सीट से विधायक के बदले सांसद विक्रम उसेंडी को मैदान में उतारा है। हालांकि 2013 में उसेंडी ही इस सीट से जीते थे। बाद में लोकसभा का चुनाव जीत गए।
दोनों तरफ से पांच-पांच नए चेहरे
भाजपा और कांग्रेस दोनों ने विधानसभा चुनाव के लिहाज से पहले चरण में पांच-पांच नए चेहरों को मैदान में उतारा है।
पहली बार कांग्रेस का दबदबा
पिछले चुनाव में कांग्रेस ने राजनांदगांव जिले की छह में चार सीटें जीतीं थीं, जबकि उससे पहले के दोनों चुनाव में उसे मात्र दो सीट मिलती थी। इसी तरह बस्तर संभाग की 12 में से आठ सीट कांग्रेस के पास है। 2008 के चुनाव में बस्तर संभाग में कांग्रेस के पास केवल एक विधायक था।
गठबंधन पर निगाहें
अपनी नई पार्टी के साथ सियासत में अस्तित्व की जंग लड़ रहे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने बसपा और सीपीआइ से गठबंधन किया है। समझौते के तहत सीपीआइ के पास दो सीट है, लेकिन पार्टी ने कुछ और सीटों पर प्रत्याशी खड़ा किया है। इस चरण में होने वाले चुनाव में गठबंधन के भविष्य को लेकर भी संकेत मिल सकते हैं।