
Raipur Local Edit: रायपुर। बाल दिवस पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने शिक्षा दृष्टिकोण- 2030 पेश करते हुए शिक्षाविदों के समक्ष गुणात्मक सुधार की चुनौती पेश की है। पं. जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शिक्षा समागम में विभिन्न प्रदेशों के शिक्षकों और चिंतकों की भागीदारी उल्लेखनीय रही, जो प्रदेश में शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने में सहायक साबित हो सकती है। स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थी कोरोना की वजह से सर्वाधिक प्रभावित रहे हैं। विभिन्न अध्ययनों में उनके पढ़ने और समझने की क्षमता में ह्रास की बात सामने आई है।
इसका सबसे बुरा प्रभाव आठवीं से 11वीं तक के विद्यार्थियों को आजीवन भुगतना पड़ सकता है। शिक्षाशास्त्रियों के सामने इस समस्या के समाधान के लिए अभी तक कोई स्पष्ट विकल्प नहीं है। पढ़ने-पढ़ाने के तरीके में बदलाव, शिक्षण व्यवस्था का प्रबंधन और समग्र रूप से शैक्षणिक स्तर में सुधार के लिए वाद-प्रतिवाद की जगह संवाद से ही सही मार्ग का सृजन किया जा सकता है। बिना किसी दुराग्रह के सबको मिल-बैठकर विकल्पों पर विचार तथा शोध-अनुसंधान करना चाहिए।
पिछले दो वर्षों में डिजिटल माध्यम मजबूत हुआ है और इसके विस्तार की क्षमता को स्वीकार करते हुए शिक्षण व्यवस्था का अंग बनाना होगा, परंतु यह भी सत्य है कि भौतिक रूप से शिक्षक का स्थान कोई नहीं ले सकता। सक्षम अभिभावकों की देखरेख में कुछ विशेष बच्चे सफलता के शीर्ष को तो छू सकते हैं, परंतु समाज की प्रगति के लिए शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच सीधा संपर्क और संवाद जरूरी है। शिक्षक प्रत्यक्ष निगरानी व्यवस्था भी होते हैं, जिनके जरिए छात्रों के विकास की सतत् प्रक्रिया जारी रहती है।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने शिक्षाशास्त्रियों से इस बात का आकलन करने का आह्वान किया है कि किन वजहों से पिछले 75 वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बुनियादी शिक्षा पर जोर दिया तो पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने उच्च शिक्षण संस्थानों के विस्तार पर बल दिया। यह समीक्षा का विषय हो सकता है कि किन वजहों से बाद के वर्षों में शैक्षणिक सुधार की गति कायम नहीं रह सकी।
ईमानदारी से की गई समीक्षा बेहतर भविष्य का आधार बन सकती है, परंतु इसमें संदेह है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति की दिशा कुछ ऐसे द्वंद्वों में फंसी दिख रही है, जिसमें राजनीतिक नेतृत्व एक-दूसरे के विचारों और दृष्टिकोण को खारिज करने पर ही ज्यादा जोर लगा रहा है। मुख्यमंत्री बघेल ने तीन वर्ष से अधिक बच्चों के लिए बालबाड़ी के साथ ही स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम विद्यालय की परिकल्पना को और व्यापक करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों के अनुरूप स्कूली शिक्षा व्यवस्था कायम करने की बात की है। इसी तरह नौवीं से 12वीं तक रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रम भी सकारात्मक कदम है। उम्मीद की जानी चाहिए कि शिक्षाविदों के मंथन के सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।