
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, रायपुर। छत्तीसगढ़ के बिजली विभाग में करीब चार हजार उच्च दाब (एचटी) औद्योगिक उपभोक्ताओं के परिसरों में स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस का आरोप है कि राज्य की सरकारी बिजली कंपनी की ओर से बिना किसी खुली निविदा के यह काम निजी क्षेत्र की कंपनी टाटा पावर को सौंपे जाने की तैयारी चल रही है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता और हितों के टकराव का गंभीर मामला करार दिया है।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री कन्हैया अग्रवाल ने इस पूरे मामले को लेकर छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कंपनी के अध्यक्ष सुबोध कुमार सिंह को ज्ञापन सौंपा है। उन्होंने इस प्रक्रिया को फौरन निरस्त करने की पुरजोर मांग की। अग्रवाल ने आरोप लगाया कि सरकारी खजाने और राज्य की बिजली कंपनी को करोड़ों रुपये की चपत लगाने की सोची-समझी साजिश रची जा रही है। उन्होंने ज्ञापन में मांग की है कि इस संदेहास्पद निर्णय के पीछे शामिल जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए।
कन्हैया अग्रवाल ने अपने बयान में कहा कि वर्ष 2010 में विधिवत खुली निविदा के माध्यम से राज्य में आटोमैटिक मीटर रीडिंग (एएमआर) व्यवस्था स्थापित की गई थी। यह आधुनिक व्यवस्था पिछले 15 वर्षों से पूरी तरह सुचारू रूप से कार्य कर रही है। रायपुर के गुढ़ियारी स्थित सेंट्रल कंट्रोल रूम से सभी औद्योगिक कनेक्शनों की ऑनलाइन रीडिंग और रियल-टाइम निगरानी सफलतापूर्वक की जा रही है। इसके बावजूद बिना किसी ठोस तकनीकी कारण के करोड़ों रुपये की इस व्यवस्था को अचानक दरकिनार किया जा रहा है।
कांग्रेस नेता ने मामले में हितों के गंभीर टकराव का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने खुलासा किया कि टाटा पावर ने चार दिसंबर 2025 को रायपुर क्षेत्र में बिजली वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। ऐसे में उसी कंपनी को मीटरिंग और डेटा नियंत्रण सौंपना पूरी तरह अनुचित है। इससे प्रतिस्पर्धी निजी कंपनी को अनुचित लाभ मिलने की आशंका है, जिससे उपभोक्ताओं और विद्युत मंडल दोनों का भारी अहित तय है। उनके मुताबिक बिना खुली निविदा के काम सौंपना वित्तीय नियमों और पारदर्शिता का खुला उल्लंघन है।
कन्हैया अग्रवाल ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि इस विवादित प्रस्ताव को तत्काल वापस नहीं लिया गया, तो पार्टी चुप नहीं बैठेगी। इस गंभीर मामले को राज्य के ऊर्जा मंत्री और राज्यपाल के समक्ष मजबूती से उठाया जाएगा। अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार और पावर कंपनी प्रबंधन ने इस मनमाने फैसले को निरस्त नहीं किया, तो राज्य के हितों की रक्षा के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा।