संदीप तिवारी, नईदुनिया, रायपुर। सावन-भादो में हो रही बारिश से आई बाढ़ के कारण भले ही रायपुर से लेकर बस्तर तक हाहाकार मचा हो, पर जल के संचय के मामले में प्रदेश पिछड़ा हुआ है। धान का कटोरा कहे जाने वाले इस प्रदेश में नहरों का विस्तार थमने, जल परियोजनाओं की लेटलतीफी और पोलावरम व महानदी अंतरराज्यीय जल विवाद ने खेतों तक सिंचाई सुविधा पहुंचाने में प्रदेश को पीछे धकेल दिया है।
प्रदेश में सबसे ज्यादा 40 लाख किसानों के परिवार मतदाता हैं। दो दशकों से प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में खेतों की सिंचाई का मुद्दा जीवंत है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में बांधों की सिंचाई क्षमता 21.84 लाख हेक्टेयर तक पहुंच चुकी है, जो राज्य गठन के बाद से 6.87 लाख हेक्टेयर की वृद्धि को दर्शाती है, लेकिन सिंचाई केवल 13.38 लाख हेक्टेयर भूमि की ही हो पा रही है। जबकि 58 लाख 81 हजार हेक्टेयर भूमि खेती योग्य है, जिसे सिंचाई की आवश्यकता है।
इतनी परियोजनाएं व बांध
प्रदेश में 12 बड़ी सिंचाई परियोजनाए हैं। छोटे-बड़े करीब 3,000 बांध हैं। बस्तर के सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर जैसे इलाकों में सिंचित क्षेत्र 15 प्रतिशत ही हैं। दुर्ग जिले में कृषि का सिंचित रकबा 2,45,298 हेक्टेयर है, लेकिन कई गांवों में सिंचाई के साधन नहीं हैं। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और सरगुजा संभाग में भी सिंचाई की सुविधा का अभाव है। प्रदेश में नहरों के अलावा अन्य संसाधनों जैसे नलकूप, सिंचाई पंप मिलाकर कुल 15.99 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है।
58 लाख हेक्टेयर खेती के योग्य
राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 137.90 लाख हेक्टेयर है, जिसमें 44.21 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। 58 लाख 81 हजार हेक्टेयर भूमि खेती के योग्य है। भौगोलिक संरचना के आधार पर राज्य में पांच प्रमुख नदी कछार हैं- उत्तर दिशा में गंगा कछार, पश्चिम में नर्मदा कछार, उत्तर-पूर्व में ब्राम्हणी कछार, मध्य भाग में महानदी तथा दक्षिण में गोदावरी कछार है।
जल संचय के ये हैं माध्यम
राज्य गठन के समय प्रदेश में सिंचाई की स्थिति सीमित थी, जिसमें तीन वृहद, 29 मध्यम और 1,945 लघु सिंचाई योजनाओं के माध्यम से कुल 13.28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता सृजित हुई थी। समय के साथ इस बुनियादी ढांचे में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। दिसंबर 2025 की स्थिति के अनुसार, प्रदेश में निर्मित वृहद सिंचाई योजनाओं की संख्या बढ़कर आठ, मध्यम योजनाएं 38, लघु सिंचाई योजनाएं 2,560 और एनीकट व स्टापडैम 1,160 हो गए हैं। वर्तमान में चार वृहद, 366 लघु सिंचाई योजनाएं और 530 एनीकट, स्टापडैम और बैराज निर्माणाधीन हैं।
जोगी, रमन, भूपेश और साय की इच्छाशक्ति
वर्ष 2000 में अजीत जोगी के समय जल संसाधन विभाग के बांधों और नहरों से सिंचित होने वाली संभावित भूमि 11.36 लाख हेक्टेयर थी, जिसे बढ़ाकर 12.22 लाख हेक्टेयर किया गया। डाॅ. रमन सिंह के कार्यकाल में यह क्षमता 17.44 लाख हेक्टेयर तक पहुंची, लेकिन वास्तविक रूप से केवल 10.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही सिंचाई हो पाई। भूपेश बघेल के कार्यकाल (2018-2023) में यह सिंचाई क्षमता 18.07 लाख हेक्टेयर रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार ने राज्य में सिंचाई नेटवर्क को मजबूत करने के लिए 14 नई सिंचाई परियोजनाओं को सैद्धांतिक सहमति दी है, जिनसे लगभग एक लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता में वृद्धि होने का लक्ष्य है।
वर्ष सिंचाई क्षमता वास्तविक सिंचाई
2000-01 11.36 5.35
2003-04 12.22 7.58
2005-06 13.47 10.32
2013-14 15.63 11.50
2018-19 17.44 10.62
2023-24 18.07 13.28
2024-25 18.23 13.38
(स्रोत: जल संसाधन विभाग की वर्तमान प्रशासनिक प्रतिवेदन के अनुसार सभी आंकड़े लाख हेक्टेयर में हैं)
अंतरराज्यीय विवाद में फंसी परियोजनाएं
पोलावरम परियोजना : छत्तीसगढ़-आंध्र प्रदेश के बीच गोदावरी नदी पर निर्माणाधीन एक वृहद बहुउद्देशीय अंतरराज्यीय परियोजना पर विवाद है। छत्तीसगढ़ में इसके बैक वाटर (बैठक पानी) के अध्ययन की जिम्मेदारी 15 अक्टूबर 2025 तक हुए एमओयू के तहत भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर को सौंपी है। डुबान क्षेत्र के गांवों पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभाव के अध्ययन के बाद आंध्र प्रदेश से मुआवजे की मांग की जाएगी।
महानदी विवाद : छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच 43 वर्षों से चल रहे महानदी जल विवाद के समाधान के लिए बैठक एक अक्टूबर 2026 को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में कर्तव्य भवन में हुई। इस बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने अपने-अपने राज्यों का पक्ष रखा। बैठक में ओडिशा ने गैर मानसून अवधि में पनबिजली उत्पादन के लिए अतिरिक्त पानी की मांग की, जिसे छत्तीसगढ़ ने अस्वीकार कर दिया।
इन परियोजनाओं को समय पर धरातल में लाने की दरकार
अरपा-भैंसाझार व्यपवर्तन परियोजना : इस परियोजना को सबसे पहले छह जून 2012 को 606.43 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिली थी। वर्ष 2016 में इस प्रोजेक्ट की लागत 1,141.90 करोड़ रुपये हो गई, लेकिन यह परियोजना पूरी नहीं हो पाई है। साथ ही इसकी मुख्य नहर से संबंधित शाखा नहरों का काम भी अधूरा है।
केलो परियोजना : रायगढ़ एवं जांजगीर-चांपा जिलों के 175 गांवों को 24,396 हेक्टेयर भूमि में खरीफ सिंचाई देने वाली यह महत्वपूर्ण परियोजना है। इसकी पुनरीक्षित लागत ₹1,264.31 लाख है। इसके तहत रायगढ़ शहर के लिए पेयजल और उद्योगों के लिए भी जल प्रविधान किया गया है। इसका शीर्ष कार्य पूर्ण और नहर कार्य 90 प्रतिशत हो चुका है।
राजीव समोदा (निसदा) व्यपवर्तन परियोजना : इस योजना के प्रथम चरण में 2,000 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता सृजित की जा चुकी है। द्वितीय चरण के निर्माण के लिए ₹260.67 करोड़ की पुनरीक्षित प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त है। इसके अंतर्गत 28,000 हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ सिंचाई के लिए लगभग 70 किमी लंबी मुख्य नहर का निर्माण कार्य तेजी से प्रगति पर है।
सोंढूर जलाशय परियोजना : धमतरी जिले के नगरी तहसील में सोंढूर नदी पर स्थित इस परियोजना की लागत ₹625.32 करोड़ है। इसका शीर्ष कार्य पूर्ण है और नहर कार्य निर्माणाधीन है। इससे नगरी-सिहावा आदिवासी क्षेत्र के 66 ग्राम लाभान्वित होंगे। वर्तमान में 12,660 हेक्टेयर क्षेत्र में क्षमता सृजित की जा चुकी है और भाटापारा शाखा नहर के लिए भी जल प्रदाय किया जाएगा।
तो व्यर्थ नहीं बह पाएगा पानी: हेमराज कुटारे
जल संसाधन विभाग, छत्तीसगढ़ के पूर्व ईएनसी हेमराज कुटारे कहते हैं कि प्रदेश में सिंचाई क्षमता बढ़ाने की प्रक्रिया में काफी समय और प्रशासनिक जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। किसी भी क्षेत्र में सिंचाई का रकबा बढ़ाने के लिए सबसे पहले एक विस्तृत सर्वे किया जाता है, जिसके तहत प्रभावित भूमि के लिए मुआवजे का निर्धारण होता है। इसके उपरांत वन और पर्यावरण से जुड़ी स्वीकृतियां लेनी होती हैं और भू-अर्जन (भूमि अधिग्रहण) की प्रक्रिया में भी अक्सर देरी होती है। कई नदियों का पानी बिना उपयोग के सीधे समुद्र में बह जाता है। यदि इन नदियों पर बांध बनाकर (जैसे पेरी नदी पर बारुका डैम का निर्माण) इस व्यर्थ बहने वाले पानी का सही तरीके से संचयन और उपयोग किया जाए, तो सिंचाई क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।
वर्तमान बांध व नहरों की मरम्मत की जरूरत: आरएन गुप्ता
पीएचई विभाग छत्तीसगढ़ के पूर्व ईएनसी व राष्ट्रीय जल संगठन के अध्यक्ष आरएन गुप्ता कहते हैं कि जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और कृषि की उन्नति के लिए बुनियादी ढांचे में सुधार बेहद आवश्यक है। अविभाजित मध्य प्रदेश में पं. श्यामाचरण शुक्ल के कार्यकाल में गांव-गांव तक बांधों का निर्माण हुआ था, लेकिन आज भी हजारों एकड़ क्षेत्र की नहरें और कई बांध मरम्मत के अभाव में जर्जर स्थिति में हैं। इसके चलते बारिश का अधिकांश पानी बह जाता है और बांधों में पर्याप्त जल संचय नहीं हो पाता। राज्य में लगातार सिमट रहे तालाबों को पुनर्जीवित और संवारने की आवश्यकता है। कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए ड्रिप इरीगेशन सिस्टम को तेजी से विकसित करने, मध्यम स्तर के बांधों की संख्या बढ़ाने और नहरों के सुदृढ़ीकरण पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए।