
नईदुनिया प्रतिनिधि, बेमेतरा। छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले में कृषि अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन और मूल्य संवर्धन की दिशा में एक और कदम आगे बढ़ाया है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी), रायपुर तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-आईआईओआर), हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में संचालित ‘वेस्ट टू वेल्थ’ कार्यक्रम के अंतर्गत रेवेंद्र सिंह वर्मा कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, बेमेतरा में अलसी के डंठल से लिनेन निर्माण इकाई स्थापित की गई है।
इस अभिनव इकाई का हाल ही में राष्ट्रीय स्तर के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिकों ने विस्तृत अवलोकन किया। इस पहल का मुख्य उद्देश्य फसल अवशेषों को बहुमूल्य उत्पाद में बदलकर किसानों की आमदनी बढ़ाना और ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबी बनाना है।
इकाई के निरीक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने अलसी के डंठल से प्राकृतिक रेशा (फाइबर) निकालने तथा उससे उच्च गुणवत्ता वाले लिनेन वस्त्र और अन्य उत्पाद तैयार करने की समूची तकनीक का अवलोकन किया। आईसीएआर-आईआईओआर, हैदराबाद के निदेशक डॉ. आर. के. माथुर ने इस प्रयास की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए कहा कि कृषि अपशिष्ट का वैज्ञानिक और व्यावसायिक उपयोग ही वेस्ट टू वेल्थ की मूल अवधारणा है। उन्होंने रेखांकित किया कि अब तक खेतों में अनुपयोगी समझकर फेंक दिए जाने वाले अलसी के डंठल अब किसानों के लिए अतिरिक्त आय का टिकाऊ माध्यम बनेंगे। डॉ. माथुर ने जोर दिया कि इस तकनीक को व्यापक रूप से किसानों तक पहुंचाने और अलसी उत्पादों के लिए मजबूत बाजार व्यवस्था तैयार करने की आवश्यकता है।
प्रधान वैज्ञानिक एवं नोडल अधिकारी डॉ. सी. सुरेश ने इस तकनीकी नवाचार को कृषि आधारित उद्यमिता का उत्कृष्ट मॉडल बताया। उन्होंने कहा कि अलसी के डंठल से रेशा निकालने, उसकी कताई, प्रसंस्करण और उत्पाद निर्माण की पूरी प्रक्रिया से महिला स्व-सहायता समूहों (एसएचजी) को सीधे जोड़ा जा सकता है। इससे ग्रामीण महिलाओं को उनके घर के समीप ही सम्मानजनक रोजगार और स्वरोजगार के बेहतरीन अवसर प्राप्त होंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। वहीं आईजीकेवी के नोडल अधिकारी डॉ. संजय द्विवेदी ने भी इस परियोजना की व्यावहारिक उपयोगिता और इसके राज्यव्यापी विस्तार की संभावनाओं पर बल दिया।
कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. अनूप कुमार सिंह के मार्गदर्शन में संचालित इस परियोजना का लक्ष्य बेमेतरा जिले में अलसी की खेती का रकबा बढ़ाना है। किसानों को जागरूक किया जा रहा है कि अलसी की फसल सिर्फ बीज और तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका डंठल भी टेक्सटाइल उद्योग के लिए कीमती कच्चा माल है। इस कार्यक्रम के दौरान तकनीकी दल के साथ वैज्ञानिक डॉ. यू. के. ध्रुव, डॉ. टी. डी. साहू, डॉ. साक्षी बजाज सहित अन्य तकनीकी विशेषज्ञ उपस्थित रहे। यह पहल कृषि अवशेष प्रबंधन और ग्रामीण सशक्तीकरण की दिशा में एक अनुकरणीय मिसाल बनने जा रही है।