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IGKV रायपुर के रिटायर्ड प्रोफेसरों का फिर धरना, PPO जारी होने के 35 दिन बाद भी पेंशन-ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के 35 सेवानिवृत्त प्राध्यापकों और कर्मचारियों का पेंशन-ग्रेच्युटी भुगतान अटका है।

By Digital DeskEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Fri, 25 Sep 2026 09:37:27 AM (IST)Updated Date: Fri, 25 Sep 2026 09:37:27 AM (IST)
IGKV रायपुर के रिटायर्ड प्रोफेसरों का फिर धरना, PPO जारी होने के 35 दिन बाद भी पेंशन-ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं
IGKV के 35 रिटायर्ड कर्मचारियों का भुगतान अटका (फाइल फोटो)

HighLights

  1. शिक्षक संघ ने 22 सितंबर से धरना शुरू किया
  2. पहले 27 जुलाई से 24 दिन किया आंदोलन
  3. लिखित कारण बताने की मांग कर रहा संघ

नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) के करीब 35 सेवानिवृत्त प्राध्यापकों, वैज्ञानिकों और कर्मचारियों के पेंशन व ग्रेच्युटी भुगतान का मामला लंबा खिंचता जा रहा है। संबंधित पेंशन प्रकरणों की विभागीय जांच, लेखा नियंत्रक और विश्वविद्यालय की समितियों द्वारा परीक्षण, ज्वाइंट डायरेक्टर ऑडिट से ऑडिट और कुलपति के अनुमोदन के बाद पेंशन पेमेंट ऑर्डर (PPO) जारी किए जा चुके हैं।

PPO के 35 दिन बाद भी भुगतान नहीं

सेवानिवृत्त शिक्षक संघ का दावा है कि पीपीओ जारी होने के करीब 35 दिन बाद भी पेंशन और ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं हुआ है। संघ के अनुसार, पेंशन प्रकरणों को आगे बढ़ाने और पीपीओ जारी कराने के लिए उसे 27 जुलाई 2026 से 24 दिनों तक आंदोलन करना पड़ा था। इसके बाद पीपीओ जारी हुए, लेकिन भुगतान लंबित रहने पर संघ ने 22 सितंबर से दोबारा धरना-प्रदर्शन शुरू किया है। सेवानिवृत्त प्राध्यापक प्रशासनिक भवन के पास धरना दे रहे हैं।


भुगतान रोकने का आधार बताने की मांग

संघ का कहना है कि जब प्रकरणों का विभिन्न स्तरों पर परीक्षण और ऑडिट हो चुका है और सक्षम स्तर से अनुमोदन के बाद पीपीओ जारी किए गए हैं, तो भुगतान लंबित रखने का कारण स्पष्ट किया जाना चाहिए। संघ ने मांग की है कि यदि किसी प्रकरण में वैधानिक या नियमगत आपत्ति है तो संबंधित सेवानिवृत्त कर्मचारी को इसकी जानकारी लिखित और नियम-सम्मत आदेश के माध्यम से दी जाए।

नियुक्ति व्यवस्था पर मतभेद

मार्च 2011 से पहले विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और वैज्ञानिकों की नियुक्तियां सहायक प्राध्यापक, कनिष्ठ विज्ञानी और कार्यक्रम समन्वयक जैसे पदों पर शासन से स्वीकृत सेटअप और यूजीसी वेतनमान के तहत होती थीं। संघ का कहना है कि इस व्यवस्था को लेकर लेखा नियंत्रक की ओर से मतभेद सामने आया था।