इंदिरा मानती थीं संकट का साथी, अटल कहते थे सत्ता को अंगुलियों पर नचाना कोई विद्याचरण से सीखे
वे मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल के पुत्र थे। इंदिरा गांधी के संकट काल में उनके साथी थे। कड़क प्रशासक थे। मखमली व्यवहार और सौम्य संवाद के लिए जाने जाते थे। आज उनकी पुण्यतिथि है। इतिहास के झरोखे से उनकी स्मृतियों को ताजा करती यह रिपोर्ट।
By Paritosh DubeyEdited By: Paritosh Dubey
Publish Date: Thu, 11 Jun 2026 03:25:25 PM (IST)Updated Date: Thu, 11 Jun 2026 03:25:25 PM (IST)
विद्याचरण शुक्ल की पुण्यतिथि पर विशेष। अकाईव परितोष दुबे नईदुनिया, रायपुर। विद्याचरण शुक्ला का राजनीतिक उदय अत्यंत वैभवशाली रहा। अविभाजित मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ला के पुत्र होने के नाते राजनीति उनके रक्त में थी। महज 27 वर्ष की उम्र में (1957) लोकसभा सांसद बनने वाले शुक्ला ने इंदिरा गांधी के दौर में केंद्र सरकार में अपनी धाक जमाई। वे नौ बार सांसद रहे और सूचना एवं प्रसारण, रक्षा, वित्त जैसे भारी-भरकम मंत्रालयों की कमान संभाली। 25 मई 2013 को बस्तर की झीरम घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर बर्बर हमला किया। हमले में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा और नंदकुमार पटेल व अन्य मौके पर ही शहीद हो गए, वहीं 84 वर्षीय वी.सी. शुक्ला को तीन गोलियां लगीं। मौत से करीब 17 दिनों तक जूझने के बाद 11 जून 2013 को उन्होंने अंतिम सांस ली। एक बेहद रसूखदार और मखमली जीवन जीने वाले नेता का अंत बस्तर की धरती पर इतना रक्तरंजित होगा, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।
आपातकाल के निर्णयों ने बनाया विवादास्पद व्यक्तित्व
1975 में लगाया गया आपातकाल वीसी शुक्ला के जीवन का सबसे विवादास्पद दौर रहा। सूचना प्रसारण मंत्री रहते हुए उन्होंने मीडिया पर सख्त सेंसरशिप लगाई। किशोर कुमार के गानों पर बैन लगाया और बीबीसी को देश से बाहर किया, उसने उनकी छवि एक कड़े प्रशासक' की बना दी। इंदिरा गांधी के अवसान के बाद, उन्होंने कांग्रेस में अपना वजूद खोते देख बगावत कर दी और वीपी सिंह के साथ राष्ट्रीय मोर्चा तथा बाद में चंद्रशेखर की सरकार में शामिल हो गए। हालांकि वे शरद पवार के साथ मिलकर भी कांग्रेस को चुनौती देते रहे, लेकिन विचारधारा के बार-बार बदलने से उनका पुराना करिश्मा फीका पड़ने लगा।
प्रशासनिक दृढ़ता की कायल थीं इंदिरा, अटल लेते थे चुटकी
आपातकाल के दौरान वीसी शुक्ला की प्रशासनिक दृढ़ता को देखकर इंदिरा गांधी ने उन्हें संकट का सारथी माना था, जो बिना झिझक कठोर फैसले ले सकता था। वहीं लालकृष्ण आडवाणी ने आपातकाल की सेंसरशिप पर शुक्ला की ओर इशारा करते हुए कहा था कि जब आपको झुकने के लिए कहा गया, तो आप रेंगने लगे। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अक्सर कहते थे, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की राजनीति वी.सी. शुक्ला के इर्द-गिर्द ही शुरू होती है और उन्हीं पर खत्म होती है। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, कि शुक्ला आपातकाल में प्रेस की आजादी का गला घोंटने वाले सबसे सख्त चेहरे थे, लेकिन वे व्यक्तिगत तौर पर बेहद मिलनसार और वाकपटु थे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में एक बहस के दौरान वीसी शुक्ला की कड़क प्रशासनिक कार्यशैली पर चुटकी लेते हुए कहा था कि शुक्ला जी का अंदाज़ ऐसा है कि वे जब बात भी करते हैं, तो लगता है जैसे कोई आधिकारिक आदेश पारित कर रहे हों। सत्ता को कैसे अपनी उंगलियों पर नचाया जाता है, यह कला कोई इनसे सीखे।
दूरदर्शन पर बॉबी का प्रसारण और किशोर कुमार पर प्रतिबंध
यूं तो विद्याचरण से जुड़े कई रोचक वाकये सार्वजनिक हैं। लेकिन बॉबी फिल्म और किशोर कुमार से जुड़े प्रसंग आज भी लोगों को याद हैं। हुआ यूं कि आपातकाल के दौरान दिल्ली में जयप्रकाश नारायण और जनसंघ की रैली होनी थी। कहा जाता है कि भीड़ रोकने के लिए सूचना प्रसारण मंत्री वीसी शुक्ला ने ठीक उसी समय दूरदर्शन पर सुपरहिट फिल्म बॉबी का प्रसारण करवा दिया, ताकि लोग घरों में रहें। हालांकि, इसके बावजूद रैली ऐतिहासिक रही। इसी तरह एक बार कांग्रेस के एक सरकारी कार्यक्रम के लिए मशहूर गायक किशोर कुमार ने गाना गाने से मना कर दिया। इससे नाराज होकर कड़क मिजाज शुक्ला ने ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर किशोर कुमार के गानों के प्रसारण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगवा दिया था।