
रायपुर(निप्र)। ससुराल से परेशान और पीड़ित एक महिला को इस्लामी कोर्ट ने तलाक दिलाकर इंसाफ दिलाया है। प्रताड़ना से तंग आकर पीड़िता अपने मायके में थी। सात साल बाद इस्लामी कोर्ट ने महिला के बारे में तस्दीक करने के बाद तलाक लेने का फैसला सुनाया है।
इस फैसले के बाद मुस्लिम समाज की उन महिलाओं के लिए फिर से एक नई जिंदगी बसर करने का रास्ता साफ हो गया है, जो पति और ससुराल की प्रताड़ना से तंग आकर जिल्लत की जिंदगी जीने मजबूर हैं। इस्लाम में तलाक का अधिकार केवल पुरुषों के पास ही सुरक्षित है और जब तक पुरुष तीन बार तलाक न बोले, महिला को तलाक नहीं मिल सकता और वह दूसरी शादी भी नहीं कर सकती।
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ऐसे में फस्खे निकाह पीड़ित औरतों की जिंदगी को रौशन कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अब मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता लेने का अधिकार भी दिया है। इसके तहत वे धारा 125 के तहत कुटुम्ब न्यायालय में गुजारा भत्ता का आवेदन लगा सकती हैं और जब तक उनकी दूसरी शादी नहीं हो जाती, वे गुजारा भत्ता का हकदार हैं। मुस्लिम महिलाओं के संरक्षण अधिनियम 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने औरत को पति की संपत्ति पर हिस्सा लेने का अधिकार दिया है।
क्या है मामला
देवेन्द्र नगर निवासी रुखसाना शेख (परिवर्तित नाम) की शादी 16 नवंबर 2007 को तरुण नगर डंगनिया निवासी सैय्यद हैदर अली (परिवर्तित नाम) के साथ हुई। शादी के तीन माह बाद ससुराल वाले दहेज, नकदी लाने और काम के लिए प्रताड़ित करने लगे। रोज-रोज की प्रताड़ना से उसकी तबीयत खराब हो गई, लेकिन इलाज के बजाय ससुराल वाले टोनही कहकर झाड़फूंक कराने लगे।
बाद में उसकी मां ने इलाज के लिए पांच हजार रुपए दिए। तब जाकर इलाज करवाया गया। इतना ही नहीं, ससुर की बुरी नीयत की जानकारी देने के बाद भी पति और सास ने कुछ नहीं कहा। परेशान महिला 25 जनवरी 2009 को अपने मायके वापस आ गई।
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महिला के पति ने उसकी रजामंदी के बिना ही 29 मई 2010 को नगरी की एक लड़की के साथ दूसरी शादी कर ली, लेकिन महिला को न तो तलाक दिया और न ही भरण पोषण का खर्चा दिया। कुछ रिश्तेदारों की एक बैठक में ससुर की नीयत और प्रताड़ना के बारे में जानकारी देने के बाद अलग-अलग रहने का फैसला सुनाया गया, लेकिन वे नहीं मानें। तब जाकर पीड़िता ने इदारा-ए-शरीया इस्लामी कोर्ट विद्या नगर में आवेदन किया।
फैसला फस्खे निकाह
महिला के आवेदन के बाद इस्लामी कोर्ट ने सैय्यद हैदर अली को तीन नोटिस दी, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुआ और महिला थाने में ब्लैकमेलिंग करने की शिकायत की। यहां तक कोर्ट की कार्ऱवाई के दौरान पुलिस भी पहुंची, लेकिन इस्लामी कोर्ट की कार्रवाई की जानकारी के बाद लौट गई। कोर्ट ने महिला के मोहल्ले और उसके पास पड़ोस में जाकर पांच लोगों से मुलाकात कर उसके चरित्र की तस्दीक की, जिसमें सभी ने महिला के चरित्रवान होने की पुष्टि की ।
इदारा-ए- शरइया इस्लामी कोर्ट के काजी सैय्यद रईस अहमद अशरफी उल जिलानी ने दोनों के निकाह को फस्ख करने का फैसला सुनाया है और महिला को तीन माहवारी के बाद दूसरा निकाह करने की आजादी दी है। इस्लामी कोर्ट ने इस बात की पुष्टि भी की है कि महिला पर ससुराल वालों ने अत्याचार किए हैं।