रायपुर। अपनी अलहदा संस्कृति, कला, जीवन शैली, दशहरा और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध बस्तर के गांव व आदिवासी संस्कृति को अब नया रायपुर में भी देखा जा सकेगा। बस्तर की अबूझमाड़िया, मुरिया जनजातियों के रहन-सहन, घर, घोटुल युवागृह, मातागुड़ी और खान-पान आदि देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
इसे देखते हुए संस्कृति विभाग नया रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन में 10 एकड़ से ज्यादा जमीन पर 'आमचो बस्तर' नाम से नई बस्ती विकसित करवा रहा है। इसके निर्माण में बस्तर के 600 से ज्यादा कामगार जुटे हैं। इस बस्ती को देखकर ऐसा लगेगा कि आप बस्तर के किसी गांव में पहुंच गए हैं। न सिर्फ संस्कृति बल्कि पुरा-अवशेष तक देखने को मिलेंगे। बस्ती निर्माण के पहले चरण का पूरा होने वाला है, जुलाई में इसका लोकार्पण भी हो जाएगा।
बांस व मिट्टी से बना घोटुल युवागृह
घोटुल युवागृह का निर्माण बांस व मिट्टी से किया गया है, जैसा बस्तर में होता है। घोटुल में आदिवासी समुदाय के युवा-युवतियों को सामाजिक रहन-सहन, आचार-व्यवहार और रिश्ते-नाते के संबंध में गहन जानकारी दी जाती है। यहां लड़कियों को घर संभालने की दृष्टि से मानसिक रूप से तैयार किया जाता है। घोटुल की साफ-सफाई और अन्य कामों का जिम्मा वहां रह रही बालिकाओं पर होता है।
बस्तर दशहरा का फूल युक्त रथ भी देखेंगे
बस्तर में आदिवासी जनजाति के लोग दशहरा बड़ी धूम-धाम से मनाते हैं। यह पर्व श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक 75 दिन चलता है। काछिन गादी से यह पर्व शुरू होता है जिसके तहत देवी से समारोह आरंभ करने की अनुमति ली जाती है। इसके बाद जोगी-बिठाई, भीतर रैनी, बाहर रैनी (रथ-यात्रा) और मुरिया दरबार होता है।
पर्व का प्रमुख आकर्षण होता है लकड़ी का 15-20 फीट ऊंचा रथ, जो फूल से सजा होता है। यह समारोह लगभग 15वीं शताब्दी से शुरू हुआ जो अनवरत चल रहा है। हर साल बस्तर दशहरा देखने देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग बस्तर पहुंचते हैं। लकड़ी का यह फूल युक्त रथ पुरखौती मुक्तांगन में भी देखने को मिलेगा। बस्तर से लकड़ी का रथ यहां आ गया है।
लौह शिल्प व आदिवासियों का घर
पुरखौती मुक्तांगन में जो बस्ती बनाई जा रही है वहां आदिवासी के घर में क्या-क्या चीजें रहती हैं, इन चीजों का उपयोग किस तरह करते हैं यह सब नजदीक से जान पाएंगे। जैसे आदिवासियों के घर में अन्नगृह, रसोई के अलावा पशुओं के लिए कमरा बनाया जाता है। घर का रंग-रोगन चित्रात्मक होता है, जो शहरी व अन्य क्षेत्र के लोगों को सहज ही आकर्षित करता है। यहां बस्तर गेट भी बनाया जा रहा है, जिसमें राज्य के पशु व पक्षी सहित लौह शिल्प देखने को मिलेंगे।
राज्य की आदिवासी संस्कृति को आम लोग जान व समझ सकें इसलिए 'आमचो बस्तर' का निर्माण किया जा रहा है। यहां बस्तर की संस्कृति, पुरा-अवशेष सहित अनेक विलुप्त होती चीजों को देखा जा सकेगा। निश्चित रूप से इसे देखने के बाद लोग आदिवासी संस्कृति से जुड़ना चाहेंगे। - डॉ. आरके अग्रवाल, संयुक्त संचालक, संस्कृति विभाग