रायपुर। छत्तीगसढ़ के लोकसभा समर में भले ही कांग्रेस और भाजपा के नए उम्मीदवार मैदान में हों, लेकिन दुर्ग लोकसभा सीट सबसे हाईप्रोफाइल मानी जा रही है। प्रदेश की एकमात्र लोकसभा सीट दुर्ग पर कांग्रेस का कब्जा है। यहां से सांसद ताम्रध्वज साहू हैं।

वहीं, दुर्ग लोकसभा क्षेत्र में आने वाली विधानसभा सीट से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू, कृषि मंत्री रविंद्र चौबे और पीएचई मंत्री गुरु स्र्द्र कुमार जीतकर आये हैं। हाल के विधानसभा चुनाव में दुर्ग की एकमात्र विधानसभा वैशालीनगर से विद्यारतन भसीन को जीत मिली है। ऐसे में दुर्ग लोकसभा ढहाना भाजपा के लिए छत्तीसगढ़ जीतने के बराबर माना जा रहा है।

राजनीतिक प्रेक्षकों की मानें तो कांग्रेस के लिए दुर्ग लोकसभा जीतना प्रतिष्ठा का सवाल है। मुख्यमंत्री सहित तीन मंत्रियों की मौजूदगी में कांग्रेस कोई कोर कसर छोड़ने को तैयार नहीं है। वहीं, भाजपा ने आपसी गुटबाजी को छोड़कर दुर्ग लोकसभा पर फोकस किया है।

सूत्रों की मानें तो दुर्ग की पूर्व सांसद और राष्ट्रीय महासचिव सरोज पांडेय, पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय और रमशीला साहू एकजुट होकर भाजपा उम्मीदवार विजय बघेल के पक्ष में उतर गए हैं। विजय के नामांकन में भी पार्टी की गुटबाजी से अलग एक नया समीकरण देखने को मिला।

भाजपा की राजनीति के जानकारों की मानें तो दुर्ग लोकसभा इसलिए भी काफी अहम है, क्योंकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल लगातार भाजपा के बड़े नेताओं पर निशाना साध रहे हैं। कई मामलों में एसआइटी का गठन करके भाजपा को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में दुर्ग में भाजपा की जीत से एक साथ तीन समीकरण साधने में मदद मिलेगी।

राजनीतिक प्रेक्षकों की मानें तो दुर्ग में भाजपा की जीत से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सीधे तौर पर कमजोर होंगे। वहीं, भाजपा यह संदेश देने में भी सफल हो जाएगी कि मुख्यमंत्री और उनके तीन मंत्रियों को उनके घर में मात दे दी गई। साथ ही भाजपा नेता केंद्रीय नेतृत्व को भी यह बताने में सफल हो जाएंगे कि पिछले चुनाव में मोदी लहर में भी भले ही हार गये थे, लेकिन इस चुनाव में एकजुटता ने जीत दिलाई है।

हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि दुर्ग से कौन जीतेगा, लेकिन इतना तय है कि भाजपा की एकजुटता कांग्रेस के लिए चुनौती जरूर पैदा कर रही है। दुर्ग की राजनीति के जानकारों की मानें तो कांग्रेस की सत्ता आने के बाद वह अपने पुराने चरित्र आपसी खींचतान में एक बार फिर जुट गई है। ताम्रध्वज साहू के बेटे को टिकट नहीं मिलने के कारण उनकी नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। प्रचार अभियान में भी ताम्रध्वज अभी तक सक्रिय नहीं हो पाए हैं।

कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव मोतीलाल वोरा के बेटे अस्र्ण वोरा को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने से उनके समर्थकों में नाराजगी देखने को मिल रही है। बताया जा रहा है कि भाजपा की नजर कांग्रेस की अंदस्र्नी राजनीति से नाराज चल रहे नेताओं पर भी है। उन्हें साधने के लिए कई स्तर की बैठकों का दौर चल चुका है।

इसकी भनक कांग्रेस दिग्गजों को भी लगी है। ऐसे में कांग्रेस उन कमजोर कड़ियों को साधने में भी जुटी है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी कांग्रेस के नाराज नेताओं से चर्चा की है और पार्टी के पक्ष में एकजुट करने का प्रयास किया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि दुर्ग की बाजी कैसे कांग्रेस और भाजपा अपने पाले में करते हैं।

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