
नईदुनिया,राज्य ब्यूरो,रायपुर। महानदी जल विवाद के समाधान की दिशा में लंबे समय बाद सकारात्मक संकेत मिले हैं। महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल की सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों राज्यों ने आपसी बातचीत के माध्यम से स्थायी समाधान निकालने की इच्छा जताई। ओडिशा के प्रस्ताव पर छत्तीसगढ़ ने भी सहमति व्यक्त की है। ट्रिब्यूनल ने इस पहल का स्वागत करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार से अगली सुनवाई से पहले लिखित आश्वासन प्रस्तुत करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 23 जुलाई को होगी।
सुनवाई के दौरान ओडिशा के एडवोकेट जनरल पीतांबर आचार्य ने ट्रिब्यूनल को बताया कि दोनों राज्य संवाद के जरिए वर्षों पुराने विवाद का समाधान चाहते हैं। इसके बाद ट्रिब्यूनल ने दोनों पक्षों को बातचीत आगे बढ़ाने का अवसर दिया। सूत्रों के अनुसार, अगली सुनवाई से पहले दोनों राज्यों के अधिकारियों की बैठक होगी, जिसमें विवादित बिंदुओं पर सहमति बनाने का प्रयास किया जाएगा।
महानदी के जल बंटवारे को लेकर छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच करीब दो दशक से विवाद चला आ रहा है। पिछली सुनवाइयों में ओडिशा ने गर्मियों के दौरान महानदी बेसिन से अधिक पानी उपलब्ध कराने की मांग की थी, जबकि छत्तीसगढ़ ने जल उपलब्धता और अपनी आवश्यकताओं का हवाला देते हुए अतिरिक्त पानी देने में असमर्थता जताई थी। इसके बाद ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों को आपसी सहमति से समाधान तलाशने की सलाह दी थी।
महानदी की लंबाई लगभग 900 किलोमीटर है। इसका लगभग 357 किलोमीटर हिस्सा छत्तीसगढ़ और 494 किलोमीटर हिस्सा ओडिशा में बहता है। शिवनाथ, हसदेव, मांड, तेल, जोंक, इब और ओंग इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं। सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जरूरतों को लेकर जल बंटवारा दोनों राज्यों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। बताया गया कि छत्तीसगढ़ द्वारा प्रस्तुत दस वर्षीय कार्ययोजना पर भी अब ओडिशा पुनर्विचार कर रहा है, जिससे विवाद के स्थायी समाधान की संभावनाएं मजबूत होती नजर आ रही हैं।
2000 के दशक की शुरुआत में राज्यों के बीच जल उपयोग को लेकर असहमति उभरी। छत्तीसगढ़ के निर्माण कार्यों के बाद ओडिशा ने जल प्रवाह कम होने की शिकायत की।
2018: केंद्र सरकार ने 'महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल' का गठन किया।
2026: दोनों राज्यों की सरकारों ने कूटनीतिक बातचीत के जरिए समाधान निकालने का निर्णय लिया है।
दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार होने से संवाद में सहजता आई है। केंद्र सरकार की मध्यस्थता और साझा राजनीतिक इच्छाशक्ति ने तकनीकी और कानूनी उलझनों को कम किया है। अब अधिकारी स्तर पर कार्ययोजनाओं पर पुनर्विचार किया जा रहा है, जिससे आपसी सहमति से सौहार्दपूर्ण समाधान निकलने की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।