
रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि
कहते हैं कि हर व्यक्ति में निर्णय लेने की क्षमता होती है, लेकिन उस पर काबिज रहना सबसे कठिन काम होता है। ऐसी ही कहानी है ब्लॉगर ललित कुमार की। ललित कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय से जीव विज्ञान में बीएससी, कर्नाटक स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी से सूचना प्रौद्योगिकी में एमएससी और ब्रिटेन की हेरियट-वॉट यूनिवर्सिटी से बायोइन्फॉर्मेटिक्स में एमएससी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ वर्ष 2006 तक सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ के रूप में कार्य किया। लेकिन ब्लॉगर बनने का काम नहीं रोका और जारी रखा। संयुक्त राष्ट्र संघ से त्यागपत्र देकर अपना ब्लॉग प्रारंभ रखा और आज विश्वभर में बीस लाख उनके फॉलोअर्स हैं। प्रभा खेतान फाउंडेशन के तत्वावधान में हुए कार्यक्रम 'कलम' में शनिवार को ललित कुमार शामिल हुए। उन्होंने कहा कि दिव्यांगता को स्वीकर करने में हमारा समाज सक्षम नहीं है, इसलिए समाज खुद दिव्यांग है।
चार वर्ष की उम्र में पोलियो से ग्रसित होने के बाद भी मैंने जीवन में संघर्ष किया, किसी भी परिस्थिति से हार न मानते हुए जीवन में सफलता के नए आयाम हासिल किए। साइंस का स्टूडेंट रहते हुए पढ़ाई के लिए विदेश गए और यूएन में सेवा दी। सयुंक्त राष्ट्र की नौकरी छोड़कर भारत आने का फैसला करने के बाद ललित अनेक रचनात्मक कार्यों में जुट गए। 2006 में कविता कोश की स्थापना की, जिसमें आज करीब डेढ़ लाख पेज हैं। इसमें देश के अनेक हिंदी कवियों की कविताएं संगृहीत हैं।
दिव्यांगता पर कहा कि हमारा समाज इसे एक बीमारी के रूप में लेता है, सामान्य रूप से स्वीकार नहीं करता इसलिए दिव्यांगों की स्थिति दयनीय बन जाती है। मुझे जब पोलियो हुआ तो अनेक परेशानियां हुईं, लेकिन मैं शुरू से असाधारण बनना चाहता था। अपनी सफलता बताया- मुझे हमेशा अग्रसर रहने वाला जीवन चाहिए इसलिए खुद को कभी भी कंफर्ट जोन में नहीं रहने दिया। मैं आगे बढ़ने के लिए लगातार खुद को चुनौतियां देता रहता हूं। जिंदगी में सभी को परेशानी आती है, लेकिन हमें हार नहीं माननी चाहिए। जिस्म तब तक नहीं हारता जब तक आपके मन में चिंगारी बाकी है।